श्रीलंका स्थित शानदार गाल किला

श्रीलंका के दक्षिणी-पश्चिमी तट पर ‘गाल किला’ अथवा ‘डच किला’ विश्व पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। इस किले का निर्माण पहले पुर्तगालियों ने करवाया था। 16वीं सदी में निर्मित यह किला एक सामान्य किला था। 17वीं सदी में डच आधिपत्य के बाद इसमें व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन करवाए गए। 16 वीं सदी से 19वीं सदी तक दक्षिणी-पूर्वी एशिया के पुरातात्त्विक स्थापत्य तथा ऐतिहासिक स्मारकों पर डच प्रभाव विशिष्ट रूप से परिलक्षित होता है। यूनेस्को द्वारा ज़ारी की गयी विज्ञप्ति में कहा गया है कि इन नगरीय संरचनाओं के समूह में 16वीं तथा 19वीं सदी की दक्षिण एशियायी तथा यूरोपीय स्थापत्यशैली का अद्वितीय सम्मिश्रण है। इसी कारण से 1988 ई में इसको विश्वविरासत के रूप में मान्यता प्रदान की गयी थी।

इतिहास-

1505 ई में इस बन्दरगाह पर लौरेंको-द-अल्मेडा के नेतृत्व में पुर्तगालियों ने अपना कदम रखा था। तत्कालीन सम्राट धर्मपराक्रमा बाहु (1484-1514) के साथ मैत्री संबंध स्थापित कर प्रायद्वीप में उल्लेखनीय विकास किया। पुर्तगालियों से पहले इब्न बतूता भी इस बन्दरगाह पर आ चुका था। पुर्तगालियों द्वारा निर्मित इस किले का इतिहास उसी समय से आरंभ होता है। 1541 ई में निर्मित किले का इतिहास उसी समय से आरंभ होता है। 1541 ई में किले के भीतर एक गिरजाघर भी बनवाया गया था। पुर्तगालियों ने विद्रोही सिंहली लोगों के लिए एक बंदी शिविर भी स्थापित किया था। 1588 ई में पुर्तगालियों ने ताड़ के पत्तों और मिट्टी से एक छोटे से किले का निर्माण किया था। बाद में बन्दरगाह की निगरानी करने के लिए तीन परकोटों व एक निरीक्षण चौकी सहित किला बनवाया।

डच आधिपत्य-

1640 ई में डच लोगों के आने के बाद परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया। सम्राट राजसिंह द्वितीय के साथ मिल कर उन्होने गाल किले पर अधिकार कर लिया। 1640 ई में कोस्टर के नेतृत्व में 2,500 सैनिकों ने किले पर अधिकार कर लिया था। सिंहली जनता ने न चाहते हुए भी किले के पुनर्निर्माण में यंत्रवत सहयोग दिया। वर्तमान किला डच स्थापत्यशैली में निर्मित है। किले का निर्माण कार्य अठारहवीं सदी के आरंभ तक चलता रहा। किले की दीवारें मूँगे तथा ग्रेनाइट से निर्मित हैं।

किले की लम्बाई,चौड़ाई व ऊंचाई पर्यावरण के आधार पर निर्धारित की गयी। चौड़ी सड़कों पर घास तथा रास्तों पर छाया की व्यवस्था की गयी। घरों का निर्माण किनारों पर किया गया। हर घर में बाग व खुले दालान की व्यवस्था थी। कहीं-कहीं चूना-पत्थर, बालू आदि भी इस्तेमाल किया गया। किले के भीतर सैन्य कमांडर का आवास, शस्त्रागार, आयुधागार था। समुद्री सुरक्षा को ध्यान में रख कर लकड़ी व रस्सी बनाने का कारख़ाना, सुरक्षागृह तथा बैरकों का निर्माण किया गया। किले के परिसर में अनेक ऐतिहासिक चर्च, मस्जिदें, व्यावसायिक एवं प्रशासनिक कार्यालय भी स्थित हैं । शाम के समय किले की दीवार के साथ-साथ भ्रमण करने पर सुखद अनुभूति होती है।

डचवासियों ने दक्षिण एशियाई स्थापत्य शैली के साथ यूरोपीय वास्तुकला का मिश्रण कर एक अद्वितीय संरचना का निर्माण किया। 52 हेक्टेयर भूमि पर ने किले में 14 गढ़ों का निर्माण करवाया । गढ़ों के नाम नक्षत्र,चंद्र,सूर्य,उषा देवी, ट्रेमोन ,क्लेपंबर्ग व एमलून रखे गए। आंतरिक संरचना में परिवर्तन तथा चारों तरफ परकोटे बन जाने के बाद डच अपने सामुद्रिक प्रतिद्वंदियों का सामना करने में पूरी तरह सक्षम हो गए थे। 52 हेक्टेयर भूमि पर फैला यह किला आज भी उसी रूप में संरक्षित है। किले के उत्तर में झूलेदार पुल तथा खाई है। किले की दीवारें 10,400 फीट लंबी है।

प्रवेश द्वार-

किले के दो प्रवेश द्वार हैं। ये दोनों ऊंचे गेट के ऊपर से नीचे की तरफ खुलते हैं। किले के उत्तर में स्थित मुख्य प्रवेशद्वार भारी सुरक्षात्मक संरचना है। पुर्तगालियों द्वारा निर्मित खाई को डच लोगों ने पुराने किले की दीवार तक अधिक चौड़ा कर दिया था। 1669ई में डच लोगों द्वारा निर्मित पुल से खाई पार की जा सकती है। आवाजाही को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रवेशद्वारों का नवनिर्माण व विस्तार होता रहा। प्रमुख द्वार पर डच तथा ब्रिटिश अभिलेख दिखाई देते हैं। प्रवेश द्वार पर 1668 ई में अंकित अक्षर”VOC”है । इसका अर्थ है ‘डच ईस्ट इंडिया कम्पनी’। इस पर दो सिंहों के मध्य मुर्गे का चित्र अंकित है। किले की दीवार पर आगे जाना पर आता है ‘काला बुर्ज’। किले का पूर्वी भाग यूट्रेच्तपॉइंट पर खत्म हो जाता है।

गाल सागर तट पर स्थित लाइट हाउस पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। गाल तट पर स्थित लाइटहाउस सागर की नीली लहरों के साथ मुग्धकारी दृश्य प्रस्तुत करता है। यही नहीं गाल किले के परिसर में स्थित होने के कारण इसका सौंदर्य द्विगुणित हो जाता है।

वर्तमान लाइट हाउस का निर्माण 1939 ई में पुराने लाइट हाउस के स्थान पर किया गया था। पुराना लाइट हाउस 1934 ई में जल कर राख़ हो गया था। यह स्वचालित लाइट हाउस आज भी काम कर रहा है। पहले लाइट हाउस की तुलना में इसकी ऊंचाई दो फीट ज़्यादा अर्थात 26.5 मीटर है। पर्यटक यहाँ पर इसके सौन्दर्य को निहारने आते हैं,साथ ही साथ समीप के तटों पर लेट कर विश्राम करते हैं।

किले की दीवार पर अगला पड़ाव ‘फ्लैग रॉक बुर्ज’ है। बन्दरगाह में प्रवेश करने वाले जहाज़ों को खाड़ी में स्थित विनाशकारी चट्टानों से सावधान रहने की चेतावनी दी जाती थी। आगे है ‘ट्रिओन बुर्ज’। यहाँ पर एक पनचक्की है। यह सागर से पानी खींच कर शहर की धूल भरी सड़कों को गीला करती है। यहाँ से सूर्यास्त का मुग्धकारी दृश्य दिखाई देता है।

वास्तव में किला एक छोटे से सुनियोजित शहर का प्रतिरूप है। आयताकार सड़कें तथा डच शैली में बने कम ऊंचे घर हैं। किले के अंदर होटल भी हैं । 1694 ई में निर्मित ओरियंटल होटल मूलतः डच गवर्नर तथा उसके कर्मचारियों के लिए था। 1865 ई में न्यू ओरियंटल होटल में परिवर्तित कर दिया गया था। 19वीं सदी तक इसमें यूरोप एवं गाल बन्दरगाह पर आने वाले यूरोपीय यात्री ठहरते थे। 2005 ई में इसका आधुनिकीकरण कर ‘अमंगला रिज़ार्ट्स’ नाम दिया गया है।

वर्ष 1796 में किले पर ब्रिटिश साम्राज्य का आधिपत्य हो गया। यह उनका दक्षिणी मुख्यालय रहा। उन्होने किले में अनेक बदलाव किए यथा खाई को पाट दिया,यूट्रेच्त बुर्ज पर लाइट हाउस की स्थापना की, चंद्र बुर्ज और सूर्य बुर्ज के मध्य गेट का निर्माण किया। 1883 ई में साम्राज्ञी विक्टोरिया के सम्मान में एक मीनार भी बनवाई गयी। किले की सुरक्षा के विचार से द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अनेक संरचनाओं का निर्माण हुआ। अपने निर्माण काल से लेकर अब तक (16-19) गाल किला दक्षिण-पूर्वी एशिया में यूरोपीयन्स द्वारा निर्मित दक्षिण एशिया की तथा यूरोपीय शैली के समन्वय से निर्मित किलेबंद नगर का अद्वितीय उदाहरण है।

विशिष्ट आकर्षण-

गाल क्लाक टावर-

गाल क्लाक टावर गाल किले में स्थित पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। यह पूर्व में गार्ड रूम के केंद्र में चंद्र गढ़ से दिखाई देता है। क्लाक टावर के निर्माण के लिए लोगों से सार्वजनिक रूप से धन संग्रहीत किया गया था। इसका निर्माण 1883 ई में डॉ.पी. डी. एंथोनिस्ज़ की स्मृति में किया गया था। डॉ. एंथोनिस्ज़ प्रसिद्ध बर्घर डॉ.थे। उन्होने लेजिस्लेटिव काउंसिल तथा दक्षिणी प्रांत में सर्जन के रूप में उल्लेखनीय काम किया था। एक कृतज्ञ रोगी मुदलियार सेमसन द एब्र्यु राजपक्षे ने आभार स्वरूप इसका निर्माण करवाया था। टावर की ऊंचाई लगभग 83 फीट है और यह किले के भीतर घुसते ही दिखाई देता है। क्लाक का घंटा प्रत्येक घंटे के बाद बजता है।

डच रिफॉर्मड चर्च-

वर्ष 1640 में डच चर्च का निर्माण हुआ था। 1752-1755 ई के मध्य इसको नवनिर्मित किया गाय। 1640 ई में पुर्तगालियों पर विजय प्राप्त करने के बाद सर्वप्रथम निर्मित होने वाले भवनों में से एक यह था। इस भव्य सफ़ेद संरचना के निर्माण में लगभग पचास वर्ष लग गए। यह किले में सर्वोच्च स्थान पर स्थित है तथा श्रीलंका के प्राचीनतम चर्चों में से एक है। चर्च के भीतर प्रार्थना सभाएं आयोजित होती हैं। भीतर कब्रिस्तान व कब्र के पत्थर भी हैं।

श्री सुधरमलाया बौद्ध मंदिर-

गाल किले में स्थित है बौद्ध मंदिर ‘सुधरमलाया मंदिर’। यह किले के केंद्र की प्रमुख पश्चिमी गली ‘रंपार्ट गली’ के सामने क्लिपेनबर्ग गढ़ में है। गढ़ के सामने निर्मित सफ़ेद मंदिर के बाहर भगवान बुद्ध की प्रतिमा निर्मित है। मंदिर के भीतर प्रार्थना सभागार, 1889 ई में निर्मित एक छोटा स्तूप, भगवान बुद्ध की लेटी हुई विशाल प्रतिमा के अतिरिक्त अन्य कई छोटी-छोटी प्रतिमाएँ है। मंदिर के प्रार्थना सभागार के ऊपर एक छोटा घंटाघर है जो इस बात का द्योतक है कि किसी समय यहाँ पर चर्च रहा होगा। वर्तमान में मंदिर के नियमित क्रियाकलापों के अतिरिक्त सभागार में योगा भी सिखाया जाता है।

गाल किले में सर्वधर्म समनव्य की भावना देखी जा सकती है। प्रत्येक धर्म और समुदाय के लोग आपस में स्नेहपूर्वक, बिना किसी भेदभाव के रहते हैं। यू.एन के पूर्व सेक्रेटरी जनरल बन की-मून ने 2016 की अपनी गाल किले की यात्रा के समय कहा था कि उन्हे विभिन्न धर्मों,समुदायों के मध्य शांतिपूर्ण व सौहार्दपूर्ण व्यवहार को देख कर अतीव प्रसन्नता हुई। इस का प्रमाण गैलेरी का यह चित्र है

राष्ट्रीय सामुद्रिक (Maritime) संग्रहालय

वर्ष 1992 में 9 मई को श्रीलंका सरकार ने राष्ट्रीय सामुद्रिक संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय लिया। पुरानी संरचनाओं को नया रंग रूप प्रदान कर उसमें प्रमुख रूप से सामुद्रिक जीवन से जुड़ी वस्तुओं को संग्रहीत किया। संग्रहालय का भंडारगृह दो मंज़िली लम्बी इमारत में है। किले का मुख्य प्रवेशद्वार ग्राउंड फ्लोर को अलग करता है। म्यूज़ियम में दो गैलेरियां विशिष्ट रूप से दर्शनीय हैं। पहली के भीतर दक्षिणी श्रीलंका में प्रयुक्त होने वाले विविध प्रकार के जलयान तथा स्थानीय मछुआरों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला सामान रखा है। दूसरी गैलेरी प्रमुख रूप से सामुद्रिक जैव विविधता पर केन्द्रित है। राष्ट्रीय नौवहन संग्राहलय तक पैदल अथवा किसी वाहन से पंहुचा जा सकता है। ऊपरी मंज़िल पर जाने का मार्ग वर्तमान मेन गेट से है जबकि निचली मंज़िल प्रमुख प्रवेश द्वार के साथ है।

गलियाँ-

किले के भीतर आयताकार गलियाँ हैं। इनके नाम डच कालीन हैं। श्रीलंका में व्यापार के लिए आए अरब-मुस्लिम मूर्स व्यापारियों के नाम पर ‘मूर्स फेरी वाला’ गली है। प्रकाश स्तम्भ वाली गली का नाम ‘प्रकाश स्तम्भ वाली गली’ है। 1936 के भीषण अग्निकांड में यह प्रकाश स्तम्भ नष्ट हो गया था। दक्षिण भारतीय पारावा प्रवासियों के लिए ‘पारावा गली’ है। ये लोग मूलतः मछुआरे तथा व्यापारी हैं। नारियल बागानों के डच मालिकों के नाम पर तथा नारियल व अन्य फलों से पेय पदार्थ बनाने वाले व्यापारियों के नाम पर भी गलियाँ हैं। अब किला प्रवासी कलाकारों, लेखकों, फोटोग्राफरों तथा कवियों का अड्डा है। उनके लिए यहाँ पर सुविधाजनक बुटीक, होटल व रेस्टौरेंट हैं।

ब्रेडफ्रूट ट्री-

डच लोगों ने गाल में पहली बार ब्रेड फ्रूट ट्री (कटहल ) का पेड़ लगाया था। श्रीलंका का सबसे पुराना ब्रेड फ्रूट का पेड़ गाल किले में अक्स्लुर्ट बुर्ज पर है। किंवदंती के अनुसार डच लोगों ने गर्म तासीर के इस पेड़ को यहाँ पर लगाया था कि यह या तो यहाँ के निवासियों को मार देगा या फिर बीमार कर देगा। लेकिन श्रीलंका वासियों ने इसका उपचार ढूंढ निकाला। उन्होने नारियल में ब्रेडफ्रूट को मिला कर एक स्वादिष्ट व्यंजन तैयार कर लिया जो आज भी बहुत लोकप्रिय है। अब तो यह वृक्ष पूरे श्रीलंका में उगाया जाता है।

किले से सूर्यास्त का मुग्धकारी दृश्य-

शाम के समय किले से सूर्यास्त का मुग्धकारी दृश्य देख कर पर्यटक चित्रलिखित रह जाते हैं । सागरतट पर सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए पर्यटक विशेष रूप से आतुर रहते हैं। हररोज शाम के समय स्थानीय लोग व पर्यटक किले के साथ-साथ सागर तट पर एकत्रित हो कर इस मनोरम दृश्य को देखकर प्रफुल्लित हो उठते हैं। आनंद से परिपूर्ण वातावरण में बच्चे खेल खेलते हैं, आसमान में पतंगें उड़ाते हैं और पर्यटक सब कुछ भुला कर देश-दुनिया की बातें करते हैं।

पेडलर गली-

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गाल किले का भ्रमण करने के उपरांत सभी पर्यटक अपने साथ स्मृति चिन्ह, हस्तशिल्प से निर्मित सुंदर शिल्पाकृतियाँ, स्वास्थ्य तथा सौंदर्य में वृद्धि करने वाले आयुर्वेद पर आधारित प्राकृतिक उपादान खरीदना चाहते हैं। इन सब के लिए गाल किले की ‘पेडलर स्ट्रीट’ सर्वोत्तम स्थान है। गली में आकर्षक स्टोर,कला दीर्घाएँ, हस्तशिल्प स्टोर,स्पा,बुटीक व रत्नों की दुकानें हैं। कला तथा शिल्प के प्रशंसकों के लिए ‘पेडलर स्ट्रीट’ में घूमना एक अविस्मरणीय अनुभूति होगी। गाल किले में मोल-भाव करना उचित नहीं। यहाँ पर सभी सामान उचित मूल्य पर मिलता है। कुछ प्रमुख दुकानें हैं-बेयरफुट ,आरकिड हाउस।

नव निर्माण-

लगभग 450 वर्ष पुराने इस किले की दीवारें स्वाभाविक रूप से कमजोर होने लगी हैं। मौसम,समुद्री लहरों के प्रभाव से पेड़-पौधों के कारण व प्रबंधन की कमियों के कारण किले की स्थिति चिंताजनक है। सुनामी के कारण भी इसकी दीवारों को काफी नुकसान पंहुचा। 2007 से 2008 तक डच इंजीनियरों ने इसकी मरम्मत का काम किया। मुख्य उद्देश्य इस विश्व धरोहर के ऐतिहासिक चरित्र को यथासंभव संरक्षित रखना है। धन की समस्या को दूर करने के लिए प्रबन्धकों ने किले के कुछ भाग को लीज़ पर देने का फैसला किया है। प्राप्त आय किले के संरक्षण तथा प्रबंधन पर खर्च की जाएगी। किले के इतिहास तथा औपनिवेशिक विरासत का संरक्षण कर पर्यटकों के लिए इस दर्शनीय स्थल को सुरक्षित रखना निश्चितरूप से एक बड़ी चुनौती है।

किला प्राचीन सैन्यशक्ति, स्थापत्यकला एवं व्यापारिक गतिविधियों को जानने का उत्कृष्ट माध्यम है। यूरोप तथा एशियायी परम्पराओं का अपूर्व संगमस्थल होने के कारण सम्पूर्ण विश्व के पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। पर्यटन के कारण स्थानीय अर्थव्यवस्था में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

विशेष-

श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पूरे विश्व के साथ जुड़ा है। यहाँ से गाल किले तक बस अथवा ट्रेन द्वारा सुविधापूर्वक पंहुचा जा सकता है। गाल किले में बजट के अनुरूप आवास, खाने-पीने की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

गाल जाने के लिए अक्तूबर-अप्रैल तथा फरवरी-अप्रैल के बीच का समय सर्वोत्तम है। इस समय में हल्की बारिश तथा सुहावना मौसम रहता है। इस समय यहाँ पर भारी भीड़ रहती है। हालांकि गाल किले की यात्रा कभी भी की जा सकती है।

निश्चित रूप से जीवन में एक बार तो किले के भ्रमण की सुखद अनुभूति अविस्मरणीय होगी।

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प्रमीला गुप्ता

भव्य पुरातन हवाना –

क्यूबा की राजधानी हवाना का डाउनटाउन है पुरातन हवाना। यह हवाना के पंद्रह नगर निगमों में से एक है।


मेक्सिको की खाड़ी के मुहाने तथा अमेरिका के फ्लॉरिडा राज्य की धुरी पर स्थित क्यूबा की राजधानी हवाना का डाउनटाउन (पुरातन हवाना) हवाना के पंद्रह नगर निगमों में से एक है। यहाँ पर धड़कता है हवाना का दिल। घनी आबादी, सुव्यवस्थित चारदीवारी से घिरा पुरातन हवाना विश्व के पर्यटकों के लिए विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। इसकी अद्वितीय, सुव्यवस्थित किलेबंदी।स्थापत्यकला को दृष्टिगत रखते हुए 1982 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने पुरातन हवाना को विश्वविरासत घोषित कर दिया था।

स्पेन शासकों ने हवाना खाड़ी की प्राकृतिक बन्दरगाह पर 1529 में इस नगर की स्थापना की थी। यह नयी दुनिया तथा पुरानी दुनिया के बीच बहुमूल्य खजाने से भरे स्पेनिश जहाजों के लिए पड़ाव का काम करता था। 17वीं शताब्दी में यह जहाज़ निर्माण का प्रमुख केंद्र बन गया था। नगर का निर्माण तत्कालीन ‘बराक शैली’ एवं ‘नियोक्लासिक स्थापत्य शैली में किया गया था। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में अनेक इमारतें ध्वस्त हो गयी थीं। कुछ इमारतों का पुनर्निर्माण किया गया। पुरातन हवाना की संकरी गलियों में आज भी अनेक मूल इमारतें संरक्षित हैं। बन्दरगाह के तट पर स्थित पुरातन हवाना में प्रशासकीय कार्यालय तथा प्लाज़ा-द- अर्मस है। फ्रांसीसी समुद्री लुटेरे जैक्स-द-सोरेस ने 1555 ई में पूरे नगर को आगजनी और लूटपाट से तहस-नहस कर ड़ाला। गिने-चुने लोग ही बचे थे। सोरेस ने जिस धन-दौलत के लालच में लूटपाट मचाई थी वह उसको नहीं मिली। उसको खाली हाथ ही लौटना पड़ा।

इस घटना के बाद स्पेन के सम्राट ने नगर की सुरक्षा को ध्यान में रख कर नगर के चारों तरफ सुदृढ़ किलेबंदी करवा दी थी। ‘केस्टिलो-द-ला-रीयल फ्यूएजन’ पहला किला था। इसका निर्माण कार्य इंजीनियर बार्टोलोम सेंचेज़ की देखरेख में 1558 ई में सम्पन्न हुआ था। अलेंजों कार्पेंटियर इसको स्तंभों पर स्थित किला कहते थे। यहाँ का प्रवेशद्वार, खंडित इमारतें, शीतल,छायादार बरामदे चित्ताकर्षक हैं। पुरातन स्मारक, किले, कानवेंट,चर्च, राजप्रासाद, संकरी गालियां, लोगों की गहमागहमी पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। क्यूबा का प्रशासन पुरातन हवाना के संरक्षण के लिए प्रत्येक संभव प्रयास कर रहा है।

पुरातन हवाना के मनोरम स्थलों का आनंद पैदल चल कर लिया जा सकता है। संकरी गलियों में घूमते फिरते,स्थानीय लोगों से बातचीत करते-करते कब स्पेनिश किला आ जाता है पता ही नहीं चलता। नवीन बराक शैली में निर्मित कैफ़े में मधुर संगीत के बीच काफी की चुसकियाँ तन-मन को नूतन ऊर्जा से परिपूर्ण कर देती हैं।

कैथेड्रल-सन- क्रिस्टोबल –

यह चर्च क्रिस्टोबल नाम के अनुरूप ही भव्य तथा पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। यह ‘पवित्र वर्जिन मेरी कैथेड्रल’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। क्यूबा की अद्वितीय बराक शैली में निर्मित इस प्लाज़ा का निर्माणकार्य 29 वर्ष में 1777 ई में पूरा हुआ था। बाहर दो विशाल घंटाघर हैं। भीतर खूबसूरत स्तम्भ, मेहराबदार छतें तथा सेंट क्रिस्टोफर की सुंदर प्रतिमा है। कहा जाता है कि यहाँ पर 1796 ई से 1898 ई तक क्रिस्टोफर के स्मृतिचिन्ह रखे हुए थे। कैथेड्रल को भीतर से देखने के बाद पर्यटक बाहर किसी कैफे में बैठ कर उसके भव्य, सुसज्जित बाह्य सौंदर्य का आनंद लेते हैं।

प्लाज़ा-द-अर्मस-

लगभग पाँच सदियों से ‘प्लाज़ा-द-अर्मस’ नगर की प्रमुख गतिविधियों का केंद्र है। इसमें अनेक कैफ़े,रेस्टौरेंट, छायादार बाग हैं। गर्मी से राहत पाने के लिए पर्यटक यहाँ पर विश्राम करते हैं। प्लाज़ा के साथ अनेक खूबसूरत इमारतें हैं। विशिष्ट है- ‘पैलेसियो-द-लो-कैपिटन्स’। यहाँ पर 60 से अधिक जनरल आए थे। अब यहाँ पर ‘म्यूजियो-द-ला-सिउडाड'( सिटी म्यूज़ियम) स्थित है। इसके हरे-भरे प्रांगण में संगीत कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। प्लाज़ा-द-अर्मस के केंद्र में स्थित है 16वीं सदी में निर्मित औपनिवेशकालीन किला ‘केस्टिलो-द-ला-फ्यूएरजा’। फवारे के समीप स्थित है क्यूबा के राष्ट्र नायक ‘केस्पेडेस’ की प्रतिमा।

ला-बोडेगिरा-डेल-मेडियो-

यहाँ पर प्रख्यात लेखकों के पदचिन्ह अंकित हैं। इस रेस्टौरेंट की स्थापना 1942 ई में हुई थी। यह प्रख्यात लेखकों का प्रिय स्थान था। पाब्लो नेरुदा, गेब्रियल गर्सिया मार्क्वेज, नाट किंग काल और अर्नेस्ट हेमिंग्वे का यह प्रिय स्थान था। पर्यटक यहाँ आते हैं, बैठकर शीतल पेय, सी फूड का स्वाद चखते हैं तथा क्यूबा के मधुर संगीत का आनंद लेते हैं। यहाँ के कण-कण में प्रसिद्ध लेखकों व संरक्षकों की छाप अंकित है।

केस्टिलो- द-ला-फ्यूएरजा-

सिटी म्यूज़ियम से थोड़ी दूरी पर स्थित है 16वीं सदी में निर्मित किला-केस्टिलो-द-ला-फ्यूएरिजा। समुद्री डाकुओं के आक्रमण से सुरक्षा को ध्यान में रख कर इस किले का निर्माण करवाया गया था। किस्मत की बात है कि उस उद्देश्य के लिए किले का उपयोग करने की कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी। इसके विपरीत यह सैन्य अधिकारियों, संभ्रांत वायक्तियों के निवासस्थल तथा बहुमूल्य वस्तुओं के भंडारगृह के रूप में इस्तेमाल किया गया। फ्रांसिस्को-द-केलोना ने इसका डिजाइन तैयार किया था और निर्माण करवाया था। इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से यह संरचना अद्वितीय है। किले की दीवारें 6मीटर मोटी तथा 10 मीटर ऊंची हैं। यहाँ के सामुद्रिक संग्रहालय में पुरातन नौकाओं के मॉडल, हथियार तथा डूबे हुए जहाजों से निकाला गया बहुमूल्य सामान रखा हुआ है।

म्यूजियो-द-ला-सिउडाडा (सिटी म्यूज़ियम)

भव्य बराक शैली में निर्मित ‘पैलेसियो-द-ला-कैपिटन्स’ में स्थित सिटी म्यूज़ियम में संरक्षित है हवाना का अतीत। ‘हाल ऑफ हिरोइक में क्रांतिकालीन विशिष्ट सामान रखा हुआ है। कला में रुचि रखने वाले एस्पेडा स्माधिस्थल पर फ्रेंच कलाकार ‘वरमे’ की समाधि को देख कर अभिभूत हो जाते हैं। सिंहासन कक्ष में विशाल शानदार कुर्सी रखी हुई है। इसका निर्माण स्पेनिश सम्राट के बैठने के लिए करवाया गया था। भाग्य से न तो सम्राट आए और न ही कुर्सी इस्तेमाल हुई। केवल संग्राहलय में दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। ‘सेलोन-द-लो-एस्प्रेजोस’ 19 वीं सदी के चित्ताकर्षक दर्पणों से सज्जित है। इसी कक्ष में 1899 ई में स्पेनिश आधिपत्य की समाप्ति की घोषणा की गयी थी। यहाँ के अन्य विशिष्ट आकर्षण हैं-‘पैरोक्वील चर्च का स्मारक’ इसमें क्यूबा की ला-गिरलिडला’ की प्राचीनतम कांस्य प्रतिमा विद्यमान है।

प्लाज़ा विएज़ा-

प्लाज़ा विएजा समय-समय पर भिन्न रंग-रूप लेता रहा है। अब यह जनसामान्य के घूमने-फिरने के लिए प्रिय स्थान है। 16वीं सदी के मध्य स्थापित इस प्लाज़ा में किसी समय युद्धाभ्यास किया जाता था। यहाँ पर खूबसूरत बाज़ार भी था। 1950 ई में यहाँ पर भूतल पार्किंग बना दी गयी। नगरवासियों के विरोध करने पर सरकार के समर्थन से प्लाज़ा का पुनर्निर्माण किया गया। अब यह प्लाज़ा पुरातन हवाना का सर्वाधिक लोकप्रिय स्थान है। क्यूबा की नवीन बराक शैली में निर्मित भवनों की शोभा देखते ही बनती है। प्लाज़ा के मध्य 18वीं सदी का एक छोटा सा सुंदर फव्वारा भी मुग्धकारी है। 18 वीं सदी की एक अन्य संरचना ‘कासा-द-कोंडा-जरुको’ की रंगीन काँच की खिड़कियाँ भी दर्शकों का मन मोह लेती हैं। इस चित्ताकर्षक स्थान की सैर करने के बाद पर्यटक 35 मीटर ऊंचे गुंबद ‘कैमरा ओब्स्क्युरा’ पर खड़े हो कर नगर की मनोरम दृश्यावली देख कर मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। एक छोटे से म्यूज़ियम में ताश का इतिहास दर्शाया गया है। देखने के बाद किसी कैफ़े में बैठ कर विश्राम किया जा सकता है।

प्लाज़ा-द-सन-फ्रांसिस्को-

पुरातन हवाना की बन्दरगाह के सामने है -प्लाज़ा-द-सन-फ्रांसिस्को। सागर से आते शीतल हवाओं के झोंके पर्यटकों के तन-मन में नूतन ऊर्जा का संचरण कर देते हैं। घुमावदार चौराहों पर नयी भव्य इमारतें दिखाई देती हैं। दो इमारतें विशेष रूप से दर्शनीय हैं-‘लोंजा-द-कमर्शिओ के मध्य है चित्ताकर्षक गुंबद ,2-बेसेलिका-मेनोर-द-सन-फ्रांसिस्को-द-असीस की मीनार से नगर तथा सागर की सुंदर दृश्यावली दिखाई देती है। यहाँ पर संगीत कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पूरे क्यूबा में बेसेलिका अपने उत्कृष्ट ध्वनि संयोजन के लिए ख्यात है। इसके मध्य है संगमरमर से बना फव्वारा-‘फ्यूएंटे-द-लो-लिओस’ किसी समय यहाँ से गुजरने वाले जहाज़ यहाँ से साफ, मीठा पानी लेते थे। 1836 ई में ग्युसेप गागिनी ने फव्वारे को देश को समर्पित कर इस का नाम ‘फाउंटेन ऑफ लायन्स’ रख दिया था।

काले ओबिस्पो-

अपने पुरातन इतिहास,समृद्ध स्थापत्यशैली तथा मनोरंजन स्थलों के लिए ‘काले ओबिस्पो’ पूरे क्यूबा में प्रसिद्ध है। यहाँ की संकरी सड़क सेंट्रल पार्क को प्लाज़ा-द-अर्मस से जोड़ती है। शाम के समय यहाँ की रौनक देखते ही बनती है। पर्यटक यहाँ पर ‘एल फ्लोरिडिता’ जैसे मशहूर रेस्टौरेंट्स में रंगीन शामें गुजारने आते हैं। बराक तथा नियोक्लासिक शैली में बनी भव्य इमारतें देखते हैं। होटल ‘एम्बोस मुंडोस’ भी प्रसिद्ध है। प्रख्यात लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे इस होटल में सात साल तक रहे थे। टेक्विकल फार्मेसी म्यूज़ियम हर्बल औषधियों के लिए प्रसिद्ध है।

केस्टिलो-द-सन-सेल्वेडोर-द-ला-पुंटा-

सागरतट पर चहलकदमी करते, बन्दरगाह का सौंदर्य निहारते हुए जा पंहुचते हैं- ‘केस्टिलो-द-ला-सेल्वेडोर-द-ला-पुंटा। यहाँ का इतिहास प्राचीन और समृद्ध है। इसने हवाना की समुद्रतटीय सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसका 1589-1610 के बीच 21 वर्षों के अंतराल में निर्माण हुआ था तथा हवाना बन्दरगाह के पश्चिमी छोर पर स्थित है। हवाना के अन्य किलों के साथ तांबे और लकड़ी की मज़बूत ज़ंजीरों के साथ जुड़ा हुआ है। आक्रमण होने की स्थिति में इन ज़ंजीरों को कस दिया जाता था। फलस्वरूप शत्रु के जहाज़ बन्दरगाह में प्रवेश नहीं कर पाते थे। यहाँ का विशिष्ट दर्शनीय स्मारक है- घोड़े पर सवार जनरल मेक्सिमो गोमेज की प्रतिमा।

होटल इंगलेटेरा-

यह क्यूबा का सबसे पुराना होटल है। इसका निर्माण 1895 ई में हुआ था। यहाँ आने वाले लोगों में अनेक ख्यात लोगों के नाम शामिल हैं यथा-अन्ना पेवलोवा, जेम्स मार्टी, विंस्टन चर्चिल आदि। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले यहाँ पर उदारवादी विचारों के व्यक्तियों की गोष्ठियाँ हुआ करती थी। एंटोनियो मेसियो ने यहीं पर बैठ कर क्यूबा की स्वतन्त्रता की योजना तैयार की थी। अब यह पर्यटकों के लिए सस्ता,सुविधासम्पन्न आवासस्थल है। यहाँ की विशाल बाल्कनी में आरामदेह कुर्सी पर बैठ कर इतिहासकार क्रांतिकाल में होटल की भूमिका के चिंतन में डूब जाते हैं।

विशिष्ट जानकारी-

हवाना के दक्षिणपश्चिम मे नौ मील दूर ‘जोस मार्टी’ अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट है। यह पूरे विश्व के साथ सम्बद्ध है। यहाँ से नगर में जाने के लिए शटल बस, कार व टैक्सी सुविधापूर्वक मिल जाती है।

पुरातन हवाना के विशिष्ट स्थलों का भ्रमण करने के इच्छुक पर्यटकों के लिए होटल ‘अम्बोस मुंडोस’ व होटल फ्लॉरिडा अधिक सुविधाजनक हैं। वैसे वहाँ पर बजट के अनुरूप अन्य आवासस्थल भी उपलब्ध हैं।

नगर में घूमने-फिरने के लिए सार्वजनिक परिवहन के अतिरिक्त टैक्सी तथा किराए की कार अन्य विकल्प है।

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प्रमीला गुप्ता

ग्रैंड प्लेस-ब्रसल्स-

ग्रोट मार्केट (डच) अथवा ग्रैंड प्लेस(फ्रेंच) बेल्जियम की राजधानी ब्रसल्स का केंद्रीय मार्केट स्क्वेयर है। इसके इर्द-गिर्द भवन, टाउन हाल व ब्रेड हाउस है। यह स्क्वेयर यूरोप के सर्वाधिक खूबसूरत टाउन स्क्वेयर में से एक है।

स्पेन के सम्राट की पुत्री आर्च डचेस इसाबेला अपनी ब्रसल्स यात्रा के दौरान 5 सितम्बर, 1599 ई को लिखती है-” मैंने शहर के टाउन स्क्वेयर, जहां पर टाउन हाल आकाश को छूता दिखाई देता है, जैसा सुंदर और चित्ताकर्षक स्थान पहले कभी नहीं देखा। घरों की सजावट अद्वितीय है। ”

पृष्ठभूमि-

सत्रहवीं सदी में निर्मित ब्रसल्स का ग्रैंड प्लेस भव्य, निजी तथा सार्वजनिक भवनों का समूह है। यहाँ महत्त्वपूर्ण राजनैतिक तथा व्यावसायिक केंद्र की स्थापत्यशैली में तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक जीवनस्तर की झलक स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

इसको इस क्षेत्र की सामाजिक सांस्कृतिक विशेषताओं, जिनमें कलात्मक जीवनशैली,उच्चकोटिकी स्थापत्य शैली के सम्मिश्रण तथा सिद्धांतों के संरक्षण के लिए विश्वविरासत घोषित किया गया है। अपने उत्कर्ष काल में यह उत्तरी यूरोप के विकसित व्यावसायिक नगर के विकास तथा उपलब्धियों का जीवंत प्रमाण है।

मूलतः ग्रैंड प्लेस सेन नदी से निकलने वाले दो झरनों के बीच रेतीली भूमि था। लोगों ने रेतीली ज़मीन को ठीक-ठाक कर के लोअर मार्केट स्थापित कर दी। बारहवीं सदी के आते-आते ब्रसल्स ब्रग्स,कोलोन तथा फ्रांस के बीच व्यापारिक मार्ग बन गया। अंग्रेज़ी ऊन, फ्रेंच शराब तथा जर्मन बीयर मार्केट में तथा बन्दरगाह में बिकने लगी।

मध्यकाल के आरंभ में यहाँ पर लकड़ी के छोटे-छोटे घर बन गए। बाद में 14वीं शताब्दी में सम्पन्न-समृद्ध कुलीन परिवारों ने पत्थरों से बड़ी-बड़ी हवेलियों का निर्माण शुरू कर दिया। शीघ्र ही यह मार्केट नगर का प्रमुख वाणिज्यिकी तथा प्रशासनिक केंद्र बन गया। प्रारम्भ में ग्रैंड प्लेस 15वीं तथा 17वीं शताब्दी के मध्य विभिन्न स्थापत्यशैलियों में निर्मित भवनों का घालमेल था।

विशिष्ट दर्शनीय स्थल-

टाउन हाल-

इसका निर्माण 1402-1455 के बीच हुआ था। बास्तुकार जैकब- वन- थिनेन थे। गोथिक शैली में निर्मित टावर का डिजाइन जन-वन-रुस्ब्रोक ने किया था। टावर के 97 मीटर ऊंचे शिखर पर ब्रसल्स के संरक्षक सेंट माइकेल की प्रतिमा स्थित है। टाउन हाल के निर्माण के बाद ग्रैंड प्लेस का नगर के केंद्र में वाणिज्यिकी का योजनाबद्ध रूप से विस्तार हुआ। आसपास की गलियों में अभी भी पुराने समय की झलक दिखाई देती है। गलियों के नाम मक्खन,पनीर, मछली, कोयला बेचने वालों के नाम पर हैं।

ब्रेड हाउस-

टाउन हाल के सामने नवगोथिक शैली में निर्मित ‘ब्रेड हाउस’ है। अब इसमे ऐतिहासिक सिटी म्यूज़ियम है। डच नाम ‘ब्रेड हाउस’ से ही इस स्थान की पृष्ठभूमि की कल्पना की जा सकती है। तेरहवीं सदी में यहाँ पर एक लकड़ी के घर में बेकरी वाले ब्रेड बेचते थे। 1405 ई में लकड़ी से बने मूल ‘ब्रेड हाल’ के स्थान पर पत्थर की इमारत बन गयी।बेकरों ने अपना सामान घर-घर जा कर बेचना शुरू कर दिया। उस समय ब्रबंट के ड्यूक ने इस इमारत में प्रशासनिक कार्यालय स्थापित कर दिया। डची पर हैप्सबर्ग ने अधिकार कर लिया था। ड्यूक का यह घर ‘किंग’स हाउस’ बन गया था। अब यह इमारत ‘किंग’स हाउस’ के नाम से जानी जाती है। सम्राट चार्ल्स के शासनकाल में 1515-1536 के बीच ‘किंग’स हाउस’ का गोथिक शैली में पुनर्निर्माण करवाया गया था।

ब्रबंट के ड्यूक्स का घर-

House of the Dukes of Brabant ग्रैंड प्लेस में सात भवनों का समूह है। यह ‘ब्रबंट के ड्यूक्स का घर’ कहलाता है। प्रत्येक भवन की पहली मंज़िल की खिड़की के नीचे ड्यूक की प्रतिमा स्थित है। देखा जाए तो यहाँ पर कभी कोई ड्यूक अथवा राजा नहीं रहा। घरों के नाम भी अतीव रोचक हैं- The Fame,The Hermit,The Fortune, The Windmill,The Tinpot, The Hill, The Beurs। इन घरों को सामूहिक रूप में ड्यूक्स का घर कहा जाता है। सभी घरों का निर्माण मध्यकाल में नहीं हुआ था। कुछ घर तो सदैव निजी संपत्ति रहे। मध्यकाल तथा उसके बाद प्रत्येक नगर संघ अथवा निगम केअंतर्गत होते थे। इनकी प्रशासन में भागीदारी होती थी। इन के सदस्य अत्यधिक सम्पन्न तथा राजनैतिक रूप से प्रभावशाली होते थे। वे अपने घरों में नियमित रूप से एक साथ बैठकर व्यापार अथवा वाणिज्य संबंधी नियमों-विनियमों पर चर्चा करते थे।

बमबारी-

13 अगस्त 1695 ई को ड्यूक ऑफ विलेराय,मार्शल फ्रांसिस-द-न्यूफिले के नेतृत्व में 70,000 सैनिकों की फ्रेंच सेना ने फ्रेंच अधिकृत नमूर (अब दक्षिण बेल्जियम) से लीग ऑफ आग्स्बर्ग की सेनाओं को खदेड़ने के लिए ब्रसल्स पर आक्रमण कर दिया। फ्रेंच सेनाओं ने असहाय नगर केंद्र पर तोपों और गोलों से भारी बमबारी की, आग लगा दी। ग्रैंड प्लेस तथा आसपास के क्षेत्र को मिट्टी में मिला दिया। वैसे तो टाउन हाल प्रमुख निशाना था लेकिन 4,000 से ज़्यादा घर जल कर राख़ हो गए थे। टाउन हाल का पत्थर से बना कुछ भाग व अन्य कुछ इमारतों का नाममात्र का हिस्सा बच पाया था।

नव निर्माण-

विनाश के बाद अगले चार वर्षों में अनेक संगठनों ने मिलकर नगर का पुनर्निर्माण करवाया। उनके काम में नगर के काउंसिलर्स व ब्रसल्स के गवर्नर ने साथ दिया। इस के लिए संगठनों को अपनी योजना को अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर सहमति लेनी आवश्यक थी। परिणामस्वरूप ग्रैंड प्लेस का निर्माण योजनाबद्ध रूप से हुआ। प्रत्यक्ष में विरोधी स्थापत्य शैलियों-गोथिक,बराक तथा लुई चौदह शैली के होते हुए भी तालमेल बेहतर था।

19वीं सदी में पुनर्निर्माण-

बेल्जियन वासियों द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए किए गए कड़े संघर्ष के बाद अंततः 1830 ई में डच सम्राट विलियम प्रथम ने बेल्जियन क्षेत्र छोड़ दिया। 1831 ई में बेल्जियन सम्राट लियोपोल्ड सिंहासन पर बैठे। ब्रसल्स को स्वतंत्र बेल्जियम की राजधानी बनाया। ब्रसल्स नगर के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ हुआ। नए भवन निर्मित किए गए। दीवारें तोड़ कर नगर का विस्तार किया गया।

1860 ई में ब्रसल्स के मेयर ने जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े पुराने ‘किंग’स हाउस’ को खरीदने के लिए नगर अधिकारियों को तैयार कर लिया। पुरानी बिल्डिंग का पुनर्निर्माण करवाया गया। निर्माण तत्कालीन फैशनेबुल नयी गोथिक शैली में हुआ।

नवनिर्माण के उपरांत इस के ऐतिहासिक संरक्षण के चैंपियन के रूप में चार्ल्स बुल्स उभर कर सामने आए। 1881ई में उन्होने ब्रसल्स के मेयर का पदभार संभाला तथा 1899 ई तक पद पर बने रहे। उनकी अंतिम उपलब्धि थी लियोपोल्ड द्वितीय की आडंबरपूर्ण निर्माण योजनाओं का विरोध तथा ब्रसल्स के पुरातन भागों का संरक्षण। बुल्स ग्रैंड प्लेस के कट्टर समर्थक थे। उन्होने 1883 ई में पारित अधिनियम के माध्यम से ग्रैंड प्लेस के बाहरी भाग के संरक्षण तथा जीर्णोद्धार के लिए आवश्यक धन उपलबद्ध करवाया। यह काम 1883-1923 ई के बीच सम्पन्न हुआ। 1887 ई में किंग’स हाउस में सिटी म्यूज़ियम स्थापित किया गया। यहाँ पर टाउन हाल की मूल प्रतिमाएँ, दीवारों की टेपस्ट्री तथा नगर से सम्बद्ध शिल्पाकृतियाँ संग्रहीत हैं। 1899 ई में ब्रसल्स के नवनिर्माण में सम्मिलित प्रमुख वास्तुशिल्पियों ने नवनिर्मित भवन L’Etoile पर बुल्स की स्मृति में विक्टर ह्युगो द्वारा डिजाइन किया गया तथा विक्टर रूसो द्वारा निर्मित स्मारक स्थापित किया।

सांस्कृतिक कार्यक्रम-

ग्रैंड प्लेस ब्रसल्समें आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम पर्यटकों के विशिष्ट आकर्षण का केंद्र है। यहाँ पर पूरा वर्ष नृत्य-संगीत व अन्य कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है। इनमें प्रमुख हैं- वार्षिक उत्सव ‘ओमेगंग’ तथा द्विवर्षीय फूलों का कालीन

ओमेगंग-

जुलाई मास के पहले रविवार को ग्रैंड प्लेस में रंग-बिरंगे परिधानों में सज-धज कर शोभायात्रा निकाली जाती है। 1549 ई में चार्ल्स पंचम, उसके पुत्र डॉन फिलिप, बहिनों-फ्रांस की साम्राज्ञी, आस्ट्रिया की एलियेनोर तथा हंगरी की मेरी के स्वागत में पहली बार शोभायात्रा निकाली गयी थी । उसके बाद से यह उसकी ऐतिहासिक पुनरावृत्ति है। ओमेगंग का वर्णन 1359 ई में भी मिलता है परंतु उस समय यह शोभायात्रा धार्मिक होती थी। अब यह धार्मिक न हो कर केवल लोकप्रथाओं पर आधारित है।

फूलों का कालीन-

प्रत्येक दो वर्ष में ग्रैंड प्लेस को फूलों के कालीन से सजाया जाता है। 300 वर्ग मीटर क्षेत्र को 80,000 ताज़ा बेगोनिया के फूलों से ढक दिया जाता है। वह स्थान सुंदर, कोमल कालीन की तरह मनमोहक दिखाई देता है। कलाकार घास से ढकी ज़मीन पर साँचों से केवल चार घंटे में खूबसूरत डिजाइन बना देते हैं। गर्मी होने के कारण घास में पहले पानी देना पड़ता है। गीली ज़मीन होने के कारण चार दिन में ही कई से. मी घास उग आती है। यह लैंडस्केप आर्किटेक्ट ई.स्टोटेमन्स के दिमाग की उपज थी। 1971 ई में उसने पहली बार फूलों का कालीन बनाया था। वास्तव में वह अपने साथियों के साथ वेस्ट इंडीज में उगने वाले खूबसूरत बेगोनिया के फूलों को लोकप्रिय बनाना चाहता था। 1860 ई में घेंट के समीप इन फूलों को उगाया जा रहा था। उस पहले कालीन ने ही दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। फिर क्या था? हर दो साल बाद ग्रैंड प्लेस में फूलों का कालीन बिछ जाता है। इस अवसर पर पर्यटक भी भारी संख्या में मौजूद रहते हैं।

बेल्जियम यूरोप में नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर देश है। ग्रैंड प्लेस के अतिरिक्त भी वहाँ पर देखने के लिए बहुत कुछ है। बेल्जियम की राजधानी ब्रसल्स पूरे विश्व के साथ हवाई मार्ग से जुड़ी है।

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प्रमीला गुप्ता

आचेन का पवित्र कैथेड्रल-जर्मनी

ऐतिहासिक,स्थापत्यशैली तथा धार्मिक दृष्टिकोण से 805 ई में निर्मित आचेन स्थित विश्व प्रसिद्ध इम्पीरियल कैथेड्रल अत्यधिक महत्त्वपूर्ण संरचना है। जर्मनी की चर्च स्थापत्यशैली पर इसके अद्वितीय डिज़ाइन का प्रभाव परिलक्षित होता है। सदियों तक यहाँ पर राज्याभिषेक होते रहे तथा श्रद्धालु पवित्र तीर्थस्थल के रूप में यहाँ की यात्रा करते रहे।

आचेन कैथेड्रल जर्मनी के प्राचीनतम चर्चों में से एक है। इसमें मध्यकालीन अमूल्य कोष संग्रहीत है। इनमें चार्ल्मग्न का राजसिंहासन (800ई) ; स्वर्णिम वेदी (1000ई); प्रवचन मंच (1020ई); चार्ल्मग्न की स्वर्णिम समाधि (1215ई) तथा वर्जिन मेरी की समाधि (1238ई) उल्लेखनीय हैं। अंतिम समाधि में अतीव प्रभावशाली स्मृतिचिन्ह संग्रहीत हैं तथा आज भी तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र हैं। भव्य कैथेड्रल के कोषागार में भी अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ प्रदर्शित हैं।

प्रथम पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्मग्न ने 786 ई में राजप्रासाद में गिरजाघर का निर्माण आरंभ करवाया था। राजप्रासाद में निर्मित गिरजाघर ‘ करोलिंगीयन’ स्थापत्यशैली का उत्कृष्ट नमूना है। 1978 ई में यूनेस्को ने इसको विश्वविरासत की सूची में सम्मिलित कर लिया था। आचेन के चार्ल्मग्न के विशाल राजप्रासाद में अब यही दर्शनीय कैथेड्रल शेष बचा है।

कैथेड्रल का डिज़ाइन-

पैलेस के कैथेड्रल का डिज़ाइन मेटज़ के ओडो ने तैयार किया था। उसने इटली में रवेना स्थित बाइजेंटाइन शैली में निर्मित ‘सन वितले’ के चर्च के अनुरूप डिज़ाइन तैयार किया था। फलस्वरूप गिरजाघर की अष्टकोणीय आकृति, धारीदार मेहराब, संगमरमर के फ़र्शों की स्वर्णिम नक्काशी को देख कर आनंद की अपूर्व अनुभूति होती है। 805 ई में इसको इम्पीरियल चर्च के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया गया था।

स्मृतिचिन्ह-

चार्ल्मग्न ने अपने जीवनकाल में यहाँ पर अनेक स्मृतिचिन्ह संग्रहीत किए थे। वे स्मृतिचिन्ह आज भी कैथेड्रल में संरक्षित रखे हैं। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं दर्शनीय है-

1- दिव्य वर्जिन का परिधान

2- बाल यीशु के कपड़े

3- सलीब पर लटके यीशु

4- धड़ से अलग होने के बाद जिस कपड़े पर बाप्तिस्त संत जॉन का सिर रखा था।

मध्यकाल में इन स्मृतिचिन्हों को देखने के लिए जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, इंग्लैंड, स्वीडन तथा अन्य देशों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते थे। 14वीं शताब्दी के मध्य इन चार भव्य स्मृतिचिन्हों को सात वर्ष के अंतराल पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की प्रथा चल पड़ी। यह प्रथा आज भी कायम है।

चार्ल्मग्न की समाधि-

चार्ल्मग्न की 814 ई में मृत्यु के बाद उसके शव को गिरजाघर के गायक मंडली के कक्ष में समाधिस्थ कर दिया गया था। 1000 ई में सम्राट ओटो तृतीय ने चार्ल्मग्न की शवपेटिका को खुलवाया। कहा जाता है कि शवपेटिका में उनका शव आश्चर्यजनक रूप से संरक्षित था। वे संगमरमर के राजसिंहासन पर राजसी परिधान तथा सिर पर ताज रखे हुए बैठे थे। उनकी गोद में बाइबल के अंश तथा हाथ में राजदंड था। टाउन हाल के विशाल कमरे की दीवार पर उनको देख रहे सम्राट ओटो व अन्य राजदरबारियों का भित्तिचित्र उत्कीर्ण है।

सम्राट फ्रेडेरिक बरबारोसा ने 1168 ई मेंचार्ल्मग्न की शवपेटिका को दोबारा खुलवाया तथा अस्थिवशेषों को पेरीयन संगमरमर की नक्काशीदार शवपेटिका में रखवाया। सम्राट बरबारोसा के अनुरोध पर चार्ल्मग्न को उसी वर्ष संत घोषित कर दिया गया। वर्ष 1168 में सम्राट बरबारोसा ने समाधि के ऊपर एक भव्य फानूस टंगवाया जो आज भी संरक्षित है। 1215ई में फ्रेडेरिक द्वितीय ने चार्ल्मग्न की अस्थियों को भव्य स्वर्णिम समाधि में रखवाया। मूलरूप से अस्थियाँ अष्टकोणीय हाल में फानूस के नीचे रखी हुई थीं। दस वर्ष बाद चार्टेरस कैथेड्रल में चार्ल्मग्न की स्मृति में एक भव्य खिड़की का निर्माण करवाया गया।

वर्ष 1349 में चार्ल्मग्न के अस्थिवशेषों व अन्य स्मृति चिन्हों को प्रदर्शित करने के लिए दो पृथक स्थान बनाए गए। चार्ल्स चतुर्थ ने चार्ल के पवित्र अवशेष स्थल पर चार्ल्मग्न की अस्थियाँ व उनकी एक अर्ध प्रतिमा स्थापित करवायी। ये दोनों कोषागार में प्रदर्शित हैं। 1474 ई से चार्ल्मग्न फ्रेंच सम्राटों के पूर्वजों के रूप में पुजनीय हैं।

गायक भवन-

इस बीच पैलेस के गिरजाघर के गायक भवन का गोथिक स्थापत्यशैली में पुनर्निर्माण किया गया। काँच के नवनिर्मित गिरजाघर को 1414ई में चार्ल्मग्न की 600वीं पुण्यजयंती पर प्रतिष्ठित किया गया था। सम्राट की समाधि को गायक भवन के पूर्वी छोर पर खिसका दिया गया था। आज भी यह वहीं पर है।

वर्तमान आचेन कैथेड्रल-

15वीं शताब्दी में तीर्थयात्रियों की भीड़ में वृद्धि देख कर अन्य कई छोटे गिरजाघर व प्रकोष्ठ निर्मित किए गए। यह विशाल परिसर ही वर्तमान में आचेन कैथेड्रल के नाम से प्रसिद्ध है। सौभाग्य से दोनों विश्व युद्धों में कैथेड्रल को कोई विशेष क्षति नहीं पंहुची। 1978 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित होने वाले 12 स्थलों में से यह एक था। यूरोप के तीन तथा जर्मनी का एकमात्र स्थल था। जीर्णोद्धार कार्य दो सदियो में 2006 ई में पूरा हुआ।

अष्टकोणीय प्रतीक-

आचेन कैथेड्रल का गुंबद अष्टकोणीय आकार में निर्मित है। चार्ल्मग्न ‘आठ’ की संख्या को अत्यधिक महत्त्व देता था। इसीलिए वेदी के ऊपर का गुंबद अष्टकोणीय है। बाइबल में भी आठ का अंक अधिक दिखाई देता है तथा मध्यकाल में इसे ईसाई धर्म का प्रतीक माना जाता था। एक पूर्ण चक्र को मध्य से चतुर्भुजाकार में काट देने पर अष्टकोण बन जाता है। पूर्णचक्र ईश्वरीय सत्ता का प्रतीक है जब कि चतुर्भुज भौतिक संसार का प्रतिनिधित्व करता है। चार कोने स्वर्ग की चार दिशाओं तथा चार मानवीय गुणों को दर्शाते हैं। चार्ल्स्मग्न ने आठ के अंक में फ्रैंक्स तथा रोमन साम्राज्य; लौकिक एवं पारलौकिक दोनों के शासक तथा शक्ति को निहित देखा। दसवीं सदी में निर्मित राजसिंहासन वेदी के पीछे स्थित है। उसके दोनों हाथों के स्मृतिचिन्ह लौकिक, पारलौकिक जगत की शक्ति के द्योतक हैं। दायें हाथ में लौकिक जगत का प्रतीक राजदंड है तो बायें हाथ में पारलौकिक जगत का प्रतीक गोलाकार चक्र है।

दर्शनीय स्थल-

पश्चिम का बाहरी भाग-

पश्चिमी भाग करोलिंगीयन शैली में निर्मित है। मूल सीढ़ियाँ तथा आले अभी भी संरक्षित हैं। पोर्च का निर्माण 17वीं सदी में तथा पश्चिमी गुंबद का ऊपरी भाग 1879-1884 के बीच निर्मित हुआ था। भव्य पश्चिमी कांस्य प्रवेश द्वार ‘वोल्फ डोर्स’ के नाम से प्रसिद्ध है। ये पुराने मॉडलों की अनुकृतियाँ है तथा इन का वज़न चार टन है। वर्तमान में भीतर जाने के लिए दायीं तरफ एक छोटा, सामान्य सा प्रवेशद्वार है। प्रवेश द्वार के बाद हाल में दूसरी सदी में निर्मित मादा भेड़िये की दो कांस्य प्रतिमाएँ तथा 1000 ई का पुराना विशाल देवदार शंकु (Pinecone)खड़ा है।

राजकीय गिरजाघर –

विश्व में करोलिंगीयन स्थापत्य शैली में निर्मित गिरजाघरों में आचेन कैथेड्रल सर्वाधिक संरक्षित है। अपने विशिष्ट अष्टकोणीय केंद्र के कारण यह अष्टभुज कहलाता है। करोलिंगीयन कालीन स्तम्भ एवं गैलेरी के कांस्य द्वार मौलिक हैं परंतु मूल नक्काशी नष्ट हो गयी है। खूबसूरत संगमरमर के फर्श का निर्माण-काल 1913 ई है। गिरजाघर के केंद्रीय गुंबद से विशाल (4. 2 मीटर) व्यास का कांस्य चक्र , बरबारोसा फानूस लटक रहा है। चार्ल्मग्न को संत की उपाधि मिलने के उपलक्ष्य में फ्रेडेरिक बरबारोसा ने इसको स्थापित करवाया था। 1165-84 के बीच यह आचेन में तैयार किया गया था और बरबारोसा व उसकी पत्नी ने इसको वर्जिन मेरी को समर्पित किया था। विशेष अवसरों पर इसमें मोमबत्तियाँ जला कर प्रकाश किया जाता है जो अतीव मुग्धकारी दिखाई देता है।

फानूस का डिजाइन अलौकिक यरूशलम का प्रतिनिधित्व करता है। यह ईश्वरीय परिकल्पना पर आधारित है लेकिन इसमें केवल आठ स्तम्भ हैं जबकि ईश्वरीय वाणी में दस स्तंभों का वर्णन है। अष्टभुज के गुंबद की भव्य नक्काशी अत्यधिक चित्ताकर्षक है। उसमें प्रभु यीशु को 24 देवदूतों से घिरे हुए दिखाया गया है। आधारशिला से अष्टभुज पर 31 मीटर की ऊंचाई पर गुंबद शोभायमान है। सदियों तक इसको उत्तरी यूरोप का सर्वोच्च गुंबद होने का गौरव प्राप्त होता रहा।

अष्टभुज में वेदी के दायीं तरफ ‘अवर लेडी ऑफ आचेन’ हाथों में नन्हें, चंचल यीशु को लिए खड़ी हैं। प्रतिमा का निर्माण काल 14वीं सदी है। वह कैथेड्रल के संरक्षक देव का प्रतिनिधित्व करती है तथा उसमें चमत्कारिक शक्ति है। 17 वीं सदी से उन पर वस्त्र तथा आभूषण चढ़ाने का प्रचलन है।

ऊपरी गैलेरी में संगमरमर का भव्य राजसिंहासन दर्शनीय है। इस पर 936-1531 ई के बीच 32 पवित्र रोमन सम्राटों का राज्याभिषेक हुआ था। यह राजसिंहासन करोलिंगीयन कालीन है। मान्यता के अनुसार सम्राट चार्ल्मग्न भी राजसिंहासन पर बैठता था यद्यपि उसका राज्याभिषेक रोम में हुआ था। संगमरमर की छह सीढ़ियों के ऊपर स्थित राजसिंहासन पुराने संगमरमर से बना सामान्य सिंहासन है।

गैलेरी के सुंदर स्तम्भ पूर्णरूप से अलंकृत हैं। चार्ल्मग्न ने 32 स्तंभों को रोम तथा रवेना की पुरानी इमारतों से मंगवाया था। उनमें से अधिकांश को फ्रेंच क्रान्ति के समय लूट लिया गया था। बाद में उनमें से 22 स्तंभों को वापिस ला कर गैलेरी में पुनर्स्थापित कर दिया गया। स्तंभों के बीच की जालियों का निर्माण भी चार्ल्मग्न के समय में हुआ था। उन पर रोमन,केल्टिक तथा फ्रेंकिश प्रभाव को दर्शाती खूबसूरत आकृतियाँ बनी हैं।

गोथिक गायक भवन तथा कोषागार-

वेदी के आगे 1414 ई में गोथिक शैली में निर्मित गायक भवन (काँच का गिरजाघर) मुग्धकारी दर्शनीय स्थल है। दीवारों में 100 फीट ऊंची रंग-बिरंगी खिड़कियाँ लगी हैं। मूल खिड़कियां आग में बुरी तरह जल गयी थी, द्वितीय विश्व युद्ध की बमबारी में पूरी तरह नष्ट हो गयी। 1950 ई में काँच की नयी रंग-बिरंगी खिड़कियाँ लगाई गयी।

अष्टभुज के सामने प्रमुख वेदी ‘ पला-द-आरो’ नामक भव्य स्वर्णिम द्वार है। इसका निर्माण काल 1000 ई है। स्वर्णिम पैनल लकड़ी के फ्रेम में जड़े हैं। ‘पला-द-आरो’,’मंडोरला’ ( बादाम के आकार का आभामंडल) के मध्य दाढ़ीविहीन यीशु बैठे हैं, एक हाथ में क्रास पकड़ कर आशीर्वाद दे रहे हैं और दूसरे हाथ में पुस्तक ले रखी है। उनके साथ वर्जिन मेरी, संत माइकेल व बाइबल के चार लेखकों के प्रतीक के रूप में चार छोटे पदक उत्कीर्ण हैं। दस अन्य पैनलों पर यीशु के मनोभावों का चित्रण है।

गायक भवन के समीप दायीं तरफ एक अन्य खजाना है-सोने का भव्य प्रवचन मंच। 1020 ई में निर्मित इसको सम्राट हेनेरिक द्वितीय ने प्रतिस्थापित किया था। स्वर्णजड़ित मंच पर हीरे,जवाहरात, बहुमूल्य रत्न लगे हैं। इनमें पुराने काँच के कटोरे भी हैं। केवल पात्र ही असामान्य नहीं हैं अपितु इसमें मिस्र की हाथीदांत से बनी छह सुंदर मूर्तियाँ भी हैं।

गोथिक गायक भवन में काँच के बॉक्स में रखी दो स्वर्णिम समाधियाँ हैं। अष्टभुज के समीप वर्जिन मेरी की समाधि है, पिछवाड़े में चार्ल्मग्न की समाधि है। वर्जिन मेरी की समाधि का निर्माणकार्य 1238 ई में पूरा हुआ था। इसमें उपरोक्त आचेन के चार भव्य स्मृति चिन्ह संरक्षित हैं। अंतिम छोर पर यीशु तथा पोप लियो तृतीय की प्रतिमाएँ हैं। लम्बी तरफ के कोनों पर सामने की तरफ मेडोना, शिशु तथा चार्ल्मग्न के चित्र उत्कीर्ण हैं। शेष लम्बाई पर 12 देवदूतों के चित्र उत्कीर्ण हैं। छत के पैनलों पर मेरी के जीवन से सम्बद्ध चित्र अंकित हैं।

चार्ल्मग्न की समाधि का निर्माण 1215 ई में हुआ था। इसमें अभी भी सम्राट के अस्थिवशेष संरक्षित हैं। सामने वाले कोने पर चार्ल्मग्न को पोप लियो तृतीय तथा राजदरबार के सदस्य रेम्स के आर्कबिशप टुर्पीन के बीच सिंहासन पर बैठे हुए दिखाया गया है। ऊपर से प्रभु यीशु सम्राट को आशीर्वाद दे रहे हैं।

समाधि की लम्बाई में चार्ल्मग्न तथा फ्रेडेरिक द्वितीय के मध्य शासन करने वाले 16 सम्राटों के चित्र उत्कीर्ण हैं। दूसरे कोने पर वर्जिन मेरी श्रेष्ठ देवदूतों गैब्रियल तथा माइकेल के साथ चित्रित हैं। उनके ऊपर विश्वास,दया, आशा के विशिष्ट गुण अंकित हैं। छत पर चार्ल्मग्न के जीवन से सम्बद्ध ,विशेष रूप से मूर्स के साथ संघर्ष के चित्र उत्कीर्ण हैं। एक चित्र में उन्हें राजकीय गिरजाघर को वर्जिन मेरी को समर्पित करते हुए दिखाया गया है।

1420 ई में पूर्ण किए गए रंगीन काँच की खिड़कियों के मध्य के स्तंभों पर 14 प्रतिमाएँ स्थित हैं- वर्जिन मेरी, 12 देवदूत तथा चार्ल्मग्न की प्रतिमाएँ। गुंबद के ऊपर छत पर भव्य आकृतियाँ चित्रित हैं। गायक भवन की दीवारों पर बाइबल से उद्धृत भित्तिचित्र (1880-!913) उत्कीर्ण हैं।

आचेन नगर में भव्य आचेन कैथेड्रल के अतिरिक्त भी अन्य कई दर्शनीय स्थल हैं। यह सम्पूर्ण विश्व के साथ हवाई मार्ग से जुड़ा है। आचेन का MST एयरपोर्ट प्रमुख नगरों के साथ सम्बद्ध है तथा कुछ ही समय में आचेन पंहुचा जा सकता है। जर्मनी के डसलडोर्फ तथा फ्रैंकफ़र्ट अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट MST से जुड़े हैं। फ्रेंकफ़र्ट, कोलोन, ब्रसल्स तथा पैरिस से तीव्र गति वाली ट्रेन भी चलती है।

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प्रमीला गुप्ता

भव्य सेलेमिए मस्जिद-तुर्की

ओटोमन शैली में निर्मित भव्य, विशिष्ट संरचनाओं में से एक सेलेमिये मस्जिद को ‘नगर का ताज’ कहा जाता है। इसको ‘सुल्तान की आखिरी बिल्डिंग’ भी कहा जाता है। 16वीं सदी की यह स्थापत्य शैली ओटोमन साम्राज्य की भव्यता तथा राजनैतिक शक्ति की परिचायक थी। मस्जिद का सौंदर्य देख कर पर्यटक,दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं।

निर्माण –

आकाश को छूती,सुरुचिपूर्ण, सुव्यवस्थित गुंबद, ऊंची पतली मीनारें ओटोमन कालीन मस्जिद स्थापत्यशैली की विशेषता रही हैं। तुर्की के एडरिने नगर में स्थित सेलेमिये मस्जिद स्थापत्य शैली के दृष्टिकोण से ऐसी ही एक आश्चर्यजनक संरचना है। प्रख्यात वास्तुशिल्पी सिनान की देखरेख में इसका निर्माणकार्य सम्पन्न हुआ था।

सेलेमिये मस्जिद तुर्की के महानगर एडरिने में स्थित है। सुलेमान महान के बेटे सलीम द्वितीय ने 1568-1574 ई के बीच इसका निर्माण करवाया था। एडरिने सलीम का प्रिय नगर था। जब उसके पिता 1548 ई में पर्शिया में विजय अभियान चला रहे थे तब वह इस नगर के बाहर शिकार का आनंद लेता था।

सेलेमिये मस्जिद का निर्माण ओटोमन साम्राज्य के उत्कर्ष काल में हुआ था। साम्राज्य के विस्तार केसेलेमिये साथ-साथ सुल्तान सलीम ने नगर के केन्द्रीकरण की आवश्यकता को अनुभव किया। तत्कालीन वास्तुशिल्पी सिनान से मस्जिद के निर्माण के लिए अनुरोध किया,ऐसी मस्जिद जो अपने आप में विशिष्ट हो तथा नगर के केन्द्रीकरण की आवश्यकता को पूरा कर सके।

सलीम ने इस स्थान का चुनाव केवल अपनी पसंद के आधार पर नहीं किया था बल्कि इसके भौगोलिक, ऐतिहासिक महत्त्व को भी ध्यान में रखा था। ओटोमन साम्राज्य के यूरोपीय क्षेत्र में स्थित एडरिने 15 वीं शताब्दी में इस्तांबुल से पहले ओटोमन साम्राज्य की राजधानी रह चुका था तथा सत्रहवीं शताब्दी तक साम्राज्य का दूसरा महत्त्वपूर्ण नगर था। ओटोमन साम्राज्य में प्रवेश करने के लिए यूरोपवासियों को एडरिने से हो कर गुजरना पड़ता था। यात्रियों पर ओटोमन साम्राज्य की शान-ओ-शौकत प्रदर्शित करने के विचार से सुल्तान सलीम द्वितीय ने इस भव्य संरचना के निर्माण का निर्णय लिया। यही नहीं उस समय इस्तांबुल में गोल्डन हॉर्न तथा पहाड़ियों पर अनेक भव्य मस्जिदें निर्मित थीं अतः एडरिने नगर के सौंदर्य में वृद्धि करने के लिए एक भव्य मस्जिद के निर्माण का विचार सर्वथा उपयुक्त था। कावक मेदिनी उपनगर में निर्मित सेलेमिये मस्जिद परिसर की अत्याधुनिक स्थापत्यशैली के सामने पुरातन, पारम्परिक शैली धूमिल पड़ गयी थी।

संरचना –

सेलेमिये मस्जिद के निर्माण में एक सीमारेखा थी। मस्जिद की इमारत बाहरी गुंबदों तथा भीतर से एकीकृत होनी चाहिए थी न कि अलग-अलग खंडों में विभाजित। इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक ही मार्ग था-वह था अनेक गुंबदों के स्थान पर केंद्र में एक विशाल गुंबद का निर्माण। सिनान ने ऐसा ही किया। प्रख्यात लेखक ओरहान पामुक के अनुसार-” केंद्र में निर्मित गुंबद साम्राज्य के राजनैतिक, आर्थिक परिवर्तनों के केन्द्रीकरण का परिचायक है ।” सिनान के एक अन्य मित्र लेखक के विचार में-‘ सिनान ने मस्जिद के निर्माण की प्रेरणा इस्तांबुल स्थित हेगीया सोफिया मस्जिद से ली थी।’

इस संदर्भ में स्वयं सिनान कहते हैं-” मैं इस धारणा को मिथ्या सिद्ध करना चाहता था कि हेगीया सोफिया जैसी संरचना का निर्माण असंभव है। सुल्तान के अनुरोध पर मैंने एक स्मारक, एक मस्जिद के निर्माण का काम हाथ में लिया था तथा हेगीया सोफिया मस्जिद के गुंबद से ऊंचे गुंबद का निर्माण करवाया।” इसकी ऊंचाई 31 मीटर है। सिनान ने मस्जिद निर्माण के लिए सर्वश्रेष्ठ तथा सुंदर स्थान चुना। मस्जिद के निर्माण में उस का श्रेष्ठ बुद्धिकौशल, सृजनात्मक डिजाइन तथा अपूर्व तकनीक परिलक्षित होती है। 2,475 वर्ग मीटर विशाल क्षेत्र में निर्मित मस्जिद में 384 खिड़कियाँ हैं इनसे आंतरिक भाग प्रकाश से आलोकित हो जाता है। खिड़कियों की संख्या में हेगीया सोफिया पीछे रह गयी है। रेम्ब्रां ने अपनी पेंटिंग्स में प्रकाश का उपयोग इसी भांति किया था।

मस्जिद की केंद्रीय संरचना को आकर्षक बनाने के लिए पारम्परिक शैली की भिन्न आकार वाली गुंबदों को डिजाइन से निकाल दिया। सिनान के विचार में छोटे तथा आंशिक गुंबदों का समूह विशाल गुंबद को ढक लेगा। केंद्रीय गुंबद को दर्शनीय बनाने के लिए बाहरी प्रांगण के चारों कोनों पर 71 मीटर ऊंची मीनारें मस्जिद के चारों ओर आकाश में राकेट के समान ऊपर उठती हुई दिखाई देती हैं। केंद्र में ऊपर की ओर उठते भव्य गुंबद पर आंशिक गुंबद, टावर तथा दीवारें हैं। मान्यता के अनुसार गोलाकार स्थापत्यशैली मानवीय एकता का प्रतीक तथा जीवन चक्र के सामान्य सिद्धान्त को प्रतिपादित करती है। मस्जिद के बाहरी तथा आंतरिक भाग की दृश्य,अदृश्य सममितियाँ ईश्वरीय संपूर्णता को साधारण पत्थर तथा गुंबद की सामान्य शक्तिशाली संरचना के माध्यम से प्रतिबिम्बित करती हैं।

संरचना में स्वच्छ, खुला आंतरिक भाग विशेष रूप से दर्शनीय है। बाहरी अलंकृत भाग ओटोमन साम्राज्य की शक्ति,समृद्धि का प्रतीक है। भीतरी सामान्य सममित भाग इस तथ्य को स्थापित करता है कि ईश्वर के साथ संवाद तथा संबंध को स्थापित करने के लिए सुल्तान को सदैव हृदय से विनम्र तथा आस्थापूर्ण होना चाहिए। भीतर प्रवेश करने से पहले शाही शान-ओ-शौकत, धन-वैभव तथा शक्ति को विस्मृत कर देना चाहिए। छोटी-छोटी खिड़कियों से छन कर आता प्रकाश, मद्धम रोशनी तथा अंधकार को दूर कर मानवीय तुच्छता को व्याख्यायित करता है।

विशाल परिसर में धार्मिक चिन्ह व अन्य विशिष्ट स्थल –

मस्जिद के भीतर इस्लाम के अनेक धार्मिक चिन्ह अंकित हैं। उदाहरण स्वरूप मस्जिद के नौ दरवाज़ों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण हैं। अद्वितीय विवरणात्मक संगमरमर की शिल्पकला, सुसज्जित टाइलें, काष्ठकला संरचना को भव्यता प्रदान करती है। मस्जिद की ओर जाते समय चार सुंदर मीनारें पर्यटकों का स्वागत करती हैं।

इस विशाल परिसर में मस्जिद के अतिरिक्त लायब्रेरी, हॉस्पिटल, स्कूल, मदरसा ( इस्लाम तथा विज्ञान का शिक्षण संस्थान इस्लामिक एकेडेमी) भी स्थित है। दार-उल-हदिश ( अल हदीथ स्कूल) तथा पंक्तिबद्ध दुकानें हैं। मस्जिद की लायब्रेरी में 2,000 हबुस्तलिखित पांडुलिपियाँ तथा 50 पुस्तकें संग्रहीत हैं।

रहस्यमय चित्रांकन-

मस्जिद का सर्वाधिक आकर्षक,रहस्यमय चित्रांकन है-‘ उलटा ट्यूलिप’। इतिहासकार अभी तक इस उल्टे ट्यूलिप के रहस्य को सुलझा नहीं पाएँ हैं। किंवदंती के अनुसार मस्जिद के स्थान पर पहले ट्यूलिप का गार्डन था। मस्जिद के लिए गार्डन के मालिक को अपना गार्डन बेचना पड़ा। ट्यूलिप गार्डन के बदकिस्मत मालिक के प्रति सहानुभूति दिखाने के विचार से ऐसा किया गया है। खेद प्रकट करने के लिए ट्यूलिप के फूल को उल्टा चित्रित किया गया है। सूर्यास्त के धूमिल प्रकाश में सेलेमिए मस्जिद का मुग्धकारी सौंदर्य अविस्मरणीय है।

बुल्गारिया द्वारा आक्रमण-

1913 ई में बुल्गारिया की तोपों ने एडरिने की मस्जिद के ऊपर गोले बरसाए। गुंबद के सुदृढ़ निर्माण के कारण मस्जिद को ज़्यादा क्षति नहीं पंहुची। मुस्तफा कमाल पाशा के आदेश पर क्षतिग्रस्त भाग की मरम्मत नहीं करवायी गयी ताकि भावी पीढ़ियाँ इससे सबक ले सकें। गुंबद का ऊपरी भाग तथा केंद्र के नीले क्षेत्र की बायीं तरफ गहरे लाल रंग के केलिग्राफ के समीप का क्षतिग्रस्त भाग आज भी देखा जा सकता है।

तुर्की 1982-1995 के 10,000 लीरा के नोट के पीछे सेलेमिये मस्जिद का चित्र अंकित है। मस्जिद अपनी अन्य संरचनाओं सहित 2011 ई में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत की सूची में सम्मिलित कर ली गयी थी।

केंद्र में स्थित होने के कारण मस्जिद तक सुगमतापूर्वक पंहुचा जा सकता है। इस्तांबुल जाएँ तो एडेरिने स्थित सेलेमिये मस्जिद को देखना न भूलें। यहाँ पर तुर्की के स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद भी चखा जा सकता है।

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प्रमीला गुप्ता

वैभवशाली नागरिक सभ्यता का प्रतीक-मोहन-जो-दड़ो

1921 ई में जब दयाराम साहनी ने हड़प्पा क्षेत्र में उत्खनन कार्य आरंभ किया तब पूरा विश्व भारत के प्राचीनतम सांस्कृतिक वैभव को देख कर स्तब्ध रह गया था। विश्व के समक्ष 2,500 ई पू भारत की एक ऐसी सभ्यता सामने आई जिस की तुलना में विश्व की अन्य प्राचीनतम सभ्यताओं का विकासक्रम नगण्य था। यह तथ्य तत्कालीन पुस्तकों से , उनमें लिखित सामग्री अथवा अन्य पठनीय लेखों से नहीं अपितु वहाँ से उत्खनित सामग्री से प्रकट हुआ था । हड़प्पा और मोहन-जो-दड़ो नामक दो स्थानों पर विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के पुरातत्त्वशेष प्राप्त हुए हैं। इसको ‘हड़प्पा सभ्यता’ अथवा ‘सिंधु सभ्यता’ भी कहा जाता है। यद्यपि इसका विस्तार बलूचिस्तान, सिंध , हरियाणा, गुजरात,पंजाब , राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक था तथापि मोहन-जो-दड़ो में सर्वाधिक वैभवशाली पुरातत्त्वशेष प्राप्त हुए हैं.

‘मोहन-जो-दड़ो’ एक सिंधी शब्द है। इसका अर्थ है-‘ मूर्दों का टीला’। वास्तव में इस का मूल नाम ‘मूर्दों का टीला’ नहीं था, मूल नाम आज भी अज्ञात है। इतिहासकारों, पुरातत्त्ववेत्ताओं ने क्षेत्रीय नामों के आधार पर इस नगर का नाम ‘मोहन-जो-दड़ो रख दिया।

खोज-

मोहन-जो-दड़ो की पुरातात्त्विक खोज 1922 ई में राखाल दास बैनर्जी ने की थी। भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल के निरीक्षण में उत्खनन कार्य आरंभ हुआ। उत्खनन में बड़ी मात्रा में इमारतें, धातुओं की मूर्तियाँ, मोहरें तथा अन्य सामान मिला। पिछले सौ वर्षों में अबतक इस नगर के केवल एक तिहाई भाग की खोज हो सकी है। अब काफी समय से उत्खनन कार्य बंद है। अनुमानतः यह क्षेत्र 200 हेक्टेयर भूमि पर फैला हुआ था। वर्तमान में पाकिस्तान में सक्खर जिले में स्थित है। यह विश्व का प्राचीनतम, सुनियोजित तथा विकसित नगर माना जाता है।

विश्व की चार प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं-पुरातन मिस्र, मेसोपोटेमिया, क्रेटे, मोहन-जो-दड़ो में मोहन-जो-दड़ो की सभ्यता सर्वाधिक विकसित थी। 1980 ई में यूनेस्को ने मोहन-जो-दड़ो के पुरातत्त्वशेषों को सांस्कृतिक विश्व विरासत की सूची में स्थान दिया था।

इस सभ्यता के प्रकाश में आने से भारत का गौरवशाली इतिहास प्रागैतिहासकाल से बहुत पीछे चला जाता है। जिस समय पाश्चात्य जगत अज्ञानता के अंधकार में विलीन था उस समय एशिया महाद्वीप के भारत में अत्यधिक विकसित सभ्यता का साम्राज्य था।

मोहन-जो-दड़ो की खुदाई में प्राप्त लिपि को समझने में आज भी भाषाविद, इतिहासकार माथा-पच्ची कर रहे हैं। आज भी रहस्य बरकरार है।

नगर निर्माण-

यह एक तथ्य है कि मोहन-जो-दड़ो अपने समय का उत्कृष्ट रूप से नियोजित नगर था। पुरातत्त्वशेषों में अनेक ऐसे उपकरण प्राप्त हुए हैं जिन का उपयोग आज भी निर्माण कार्यों में किया जाता है। वहाँ की चौड़ी सड़कों और गलियों में आराम सेघूमा जा सकता है। यह नगर आज भी वहीं पर स्थित है। यहाँ की सड़कें चौड़ी थी तथा उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम की ओर जाती थीं। इमारतें ऊंचे-ऊंचे चबूतरों पर अलग खंडों में बनी हुई थी। इमारतों का निर्माण पक्की ईंटों से किया गया था। दीवारों की मोटाई, सीढ़ियों , दीवारों में काटी गयी नालियों से स्पष्ट है कि इमारतें बहुमंज़िली भी होती थी। घरों में आँगन, कमरे, शौचालय आदि की व्यवस्था होती थी। नालियों की व्यवस्थता तथा स्वच्छता का जैसा प्रबंध मोहन-जो-दड़ो में है वैसा विश्व के किसी भी देश में शताब्दियों तक देखने को नहीं मिलता।

प्रसिद्ध जलकुंड-

मोहन-जो-दड़ो की प्रसिद्ध इमारतों में ‘विशाल स्नानागार’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह दैव-मार्ग गली में स्थित लगभग 40 फीट लम्बा और 25 फीट चौड़ा जलकुंड है। इसकी गहराई 7 फीट है। भीतर जाने के लिए उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियाँ बनी हैं। कुंड के तीन ओर साधुओं के लिए कक्ष बने थे। उत्तर में दो पंक्तियों में आठ स्नानघर थे। इन का निर्माण बहुत कुशलता के साथ किया गया था। किसी भी स्नानघर का द्वार दूसरे स्नानघर के सामने नहीं खुलता था। जलरोधी बनाने के लिए जलकुंड का फर्श ईंटों को अच्छी तरह से घिस कर बनाया गया था। दीवारों के पीछे 2.54 से.मी मोटे बिटूमेन का लेप किया गया था। कुंड में पानी भरने के लिए समीप ही कुआं था और गंदे पानी की निकासी के लिए ऊंची मेहराबदार नाली थी। जॉन मार्शल के अनुसार उस समय उपलब्ध सामग्री से इससे अधिक सुंदर और मजबूत निर्माण कर पाना असंभव था।

अन्नागार-

जलकुंड के पश्चिम में एक विशाल अन्नागार था। यह सत्ताईस खंडों में विभाजित था। इसमें संग्रहीत अनाज को भूमितल की नमी से बचाने के लिए हवा गुजरने के लिए बीच में एक संकरी गली थी। ऊपरी भाग लकड़ी के खंभों पर टिका था। उस समय जब सिक्कों का प्रचलन नहीं रहा होगा तब अन्नागार का महत्त्व आर्थिक रूप से अत्यधिक रहा होगा। कर अनाज के रूप में वसूल किया जाता होगा और वेतन भी अनाज के ही रूप में दिया जाता होगा।

कृषि-

खुदाई में इस बात के प्रमाण मिले हैं कि यह सभ्यता कृषि और पशुपालन पर आधारित रही होगी। यहाँ पर खेती के लिए सिंध के पत्थरों और राजस्थान के तांबे से बनाए गए उपकरणों का उपयोग होता था। उत्खनन में गेंहू, सरसों, कपास, जौ और चने की खेती के प्रमाण मिले हैं। यहाँ पर कई प्रकार की खेती होती थी। कपास को छोड़ कर अन्य सभी बीज़ यहाँ पर मिले हैं। विश्व में सूट के सबसे पुराने दो कपड़ों में से एक का नमूना यहीं पर मिला था। खुदाई में यहाँ पर कपड़ों की रंगाई करने का एक कारख़ाना भी मिला है।

नगर नियोजन-

मोहन-जो-दड़ो की इमारतें यद्यपि अब खंडहरों में परिवर्तित हो चुकी हैं तथापि सड़कों तथा गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये पुरातत्त्वशेष ही पर्याप्त हैं। सड़कों का निर्माण ग्रिड प्रणाली पर आधारित है। पूर्व में सम्पन्न लोगों का इलाका है क्योंकि यहाँ पर बड़े घर,चौड़ी सड़कें तथा बहुत सारे कुएं हैं। नगर की सड़कें इतनी चौड़ी हैं कि दो बैलगाड़ियाँ एक साथ गुजर सकती हैं। बिशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि सड़क की तरफ घरों का पिछवाड़ा है, प्रवेशद्वार अंदर गली में है। स्वास्थ्य, प्रदूषण के दृष्टिकोण से नगर निर्माण की योजना अद्वितीय है।

जल-संस्कृति-

इतिहासकारों के मतानुसार मोहन-जो-दड़ो सिंधु घाटी सभ्यता कुएं खोद कर भूजल तक पंहुचने वाली पहली सभ्यता है। यहाँ पर लगभग 700 कुएं पाए गए हैं। बेजोड़ जलनिकासी, कुओं, बावड़ियों और नदियों को देख कर कहा जा सकता है कि ‘मोहन-जो-दड़ो सभ्यता वस्तुतः जल संस्कृति थी।

कला,शिल्प-

मोहन-जो-दड़ो के निवासी उत्कृष्ट शिल्पकार व कलाकार थे। वास्तुकला अथवा नगर निर्माण ही नहीं अपितु धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृदाभांडों पर मानव, वनस्पति, पशु-पक्षियों का चित्रांकन, मोहरें, उनपर उत्कीर्ण महीन आकृतियाँ, खिलौने, केश विन्यास,आभूषण और सुंदर लिपि से सिंधु सभ्यता की तकनीकी निपुणता के साथ-साथ सुरुचिपूर्ण कला और शिल्प का भी पता चलता है। पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार सिंधु सभ्यता की विशेषता उसका सौंदर्यबोध है। यह राजपोषित अथवा धर्मपोषित न हो कर समाजपोषित थी। मोहन-जो-दड़ो उत्खनन में एक विशेषता देखने को मिलती है। यहाँ पर कोई महल,मंदिर अथवा स्मारक नहीं मिले। पुरातत्त्वशेषों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मोहन-जो-दड़ो में राजसत्ता न हो कर लोकतन्त्र था। लोग सुशासन, विनम्रता और स्वच्छता में विश्वास करते थे। युद्ध का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था।

धर्म-

इस सभ्यता में धर्म ने प्रकृति से चल कर देवत्व तक की यात्रा निर्धारित थी। एक ओर वृक्ष पूजा के साक्ष्य मिलते हैं तो दूसरी ओर पशुपति शिव की मूर्ति तथा देवी की पूजा के व्यापक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ प्राप्त चित्रण से ज्ञात होता है कि उस समय देवता और दानव दोनों ही उपास्य थे। अध्यात्म और कर्मकांड दोनों विद्यमान थे। धडविहीन ध्यानावस्थित सन्यासी की आकृति आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक है तो देवी के सन्मुख पशुबलि के लिए बंधे बकरे की आकृति गहनतम कर्मकांड की प्रतीक। प्रमुख धार्मिक स्वरूप शैवधर्म, शिव आर्यों के पूर्व भारत के मूलवासियों तथा आर्येत्तर जातियों के आराध्य रहे हैं। शिव उत्पादन के देवता के रूप में उपास्य थे। शिव के साथ बैल का चित्रण उनका उस काल के उत्पादक देवता होने का बोध कराता है। आज भी कृषि में बैलों तथा सांडों का उपयोग होता है। शिव पूजा का प्रारम्भ हड़प्पा काल से माना जाता है। पुरातत्त्वशेषों में कुछ मुहरों पर स्वस्तिक तथा सूर्य का चिन्ह इस ओर संकेत करते हैं कि उस समय वैष्णव सम्प्रदाय पूर्णरूप से विकसित न हुआ हो परंतु उसका बीजारोपण हो चुका था। आदिकाल से ही सभ्यताओं में शक्ति पूजा का विधान रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता में भी देवी की उपासना के साक्ष्य मिलते हैं। शक्ति की उपासना पृथ्वी से सम्बद्ध है वहीं से आरंभ होती है ‘मातृदेवो’ की भावना। मोहन-जो-दड़ो में एक मुद्रा पर अंकित सात मानव आकृतियाँ ‘सप्तमातृका’ का बोध करवाती है। वह युग धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों का युग रहा होगा। तंत्र-मंत्र भी प्रचलन में रहा होगा।

संग्रहालय-

मोहन-जो-दड़ो में स्थित संग्रहालय छोटा ही है। प्रमुख वस्तुएँ कराची, लाहोर, दिल्ली और लंदन के संग्रहालयों में संरक्षित हैं। यहाँ पर काला पड़ गया गेंहू, तांबे और कांसे के बर्तन,मुहरें, चाक पर बने विशाल मृदाभांड, उन पर चित्रित काले-भूरे चित्र, चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल के पत्थर, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटों वाली चक्की, कंघी, रंग-बिरंगे पत्थरों के मनकों वाले हार और पत्थर के औज़ार रखे हुए हैं। संग्रहालय में रखी वस्तुओं में सूइयाँ भी हैं। खुदाई में तांबे और कांसे की बहुत सारी सुइयां मिली थी। इन में से एक सुई दो इंच लम्बी थी। काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयां मिली थी। समझा जाता है कि ये सुइयां महीन कशीदाकारी के काम में आती होंगी। इन के अतिरिक्त हाथीदांत और तांबे के सुए भी मिले हैं।

पतन-

सिंधु घाटी सभ्यता के विलुप्त होने का अभी तक कोई ठोस कारण नहीं मिला है। कुछ इस का कारण प्राकृतिक आपदाएँ,भूकम्प इत्यादि मानते हैं जबकि अन्य रेडियो एक्टिव विकिरणों को इस विनाश का कारण मानते हैं। जो भी हो मोहन-जो-दड़ो के आँचल में छिपा है एक गौरवशाली सभ्यता-संस्कृति का इतिहास।

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प्रमीला गुप्ता

बोरोबुदूर-विश्व का विशालतम बौद्ध मंदिर

दक्षिण-पूर्वी एशिया में स्थित इन्डोनेशिया के मध्य जावा प्रांत में है विश्व का विशालतम महायान बौद्ध मंदिर-बोरोबुदूर। ‘ बोरोबुदूर’ शब्द की व्युतपत्ति दो शब्दों के समनव्य से हुई है। ‘बोरो’ अर्थात ‘विशाल’ व ‘बुदूर’ अर्थात ‘बुद्ध’। अतः विशाल बुद्ध। जावा की स्थानीय भाषा में ‘बुदूर’ का अर्थ पर्वत भी है। एक उच्च पर्वत की भांति उन्नत शीर्ष के साथ खड़े ‘बोरोबुदूर’ मंदिर का यह अर्थ भी सार्थक दिखाई देता है। दो ज्वालामुखी पर्वतों व नदी के बीच स्थित होने के कारण यहाँ की भूमि अत्यधिक उपजाऊ है।

पुरातत्त्वविदों के अनुसार बोरोबुदूर का निर्माण आठवीं सदी में प्रारम्भ हुआ था। उस समय शैलेंद्र राजवंश के सम्राट श्री विजय का शासन था। इसका निर्माणकार्य लगभग तीन सदियों (आठवीं से दसवीं) तक चला लेकिन इसकी सम्पूर्ण रूपरेखा प्रारम्भ में ही परिकल्पित कर ली गयी थी। यही कारण है कि कई चरणों में निर्मित होने के बाद भी इसके विभिन्न भागों में अपूर्व सामंजस्य देखने को मिलता है। मान्यता के अनुसार इस विशाल अद्वितीय संरचना के वास्तुशिल्पी गुणधर्मी थे लेकिन उनके जीवन के संबंध में अधिक कुछ ज्ञात नहीं है।

पंद्रहवीं शताब्दी में मुस्लिम आधिपत्य के बाद जनसामान्य ने इस स्थान का परित्याग कर दिया था। धीरे-धीरे यह विशाल मंदिर मानव दृष्टि से ओझल हो गया। इर्द-गिर्द घना जंगल उग आया। कई सदियों तक यह ज्वालामुखी की राख़ और घने जंगल तले दब कर इसी प्रकार मानव दृष्टि से ओझल रहा।

खोज व पुनर्निर्माण-

इस विलुप्त स्थान की खोज 1907 ई में लेफ्टिनेंट थॉमस स्टेमफोर्ड रैफल्स ने की थी। वे उस समय मध्य जावा के ब्रिटिश गवर्नर थे। उन्होने डच इंजीनियर एच.सी. कार्नेलिउस की सहायता से 20 वर्ष के अथक प्रयास से विश्व की इस अमूल्य सम्पदा के पुरातत्त्वशेष खोज निकाले। इसकी खोज व जीर्णोद्धार का श्रेय रैफल्स के अथक प्रयासों को जाता है।

इन्डोनेशिया सरकार ने यूनेस्को के सहयोग से इसका पुनर्निर्माण कार्य आरंभ किया। दोनों की संयुक्त परियोजना के अंतर्गत बोरोबुदूर का पुनर्निर्माण कार्य 1973 ई में पूरा कर लिया गया था। 1991 ई में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति मे बोरोबुदूर को सांस्कृतिक धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी। पुनर्निर्माण के बाद यह मंदिर सम्पूर्ण विश्व के बौद्ध श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों के आकर्षण का विशिष्ट केंद्र बन गया था।

संरचना-

मंदिर एक विशाल चबूतरे पर निर्मित है। चबूतरे पर एक के ऊपर एक नौ वेदिकाएँ बनी हुई हैं। नीचे से ऊपर पहली छह वेदिकाएँ वर्गाकार हैं तथा ऊपर की तीन वेदिकाएँ वृत्ताकार हैं। सब से ऊपर की वेदिका के ऊपर वृत्ताकार स्तूप निर्मित है।

नीचे की छह वेदिकाओं के चारों तरफ परिक्रमापथ बना हुआ है। परिक्रमापथ के दोनों ओर भित्तियों पर भगवान बुद्ध व बोधिस्त्वों के जीवन से सम्बद्ध सुंदर चित्र उत्कीर्ण हैं। प्रत्येक मंज़िल के प्रवेशद्वार पर दोनों ओर द्वारपाल के रूप में सिंह की प्रतिमा अवस्थित है। ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों की व्यवस्था है।

मंदिर के निर्माण में पत्थरों का उपयोग हुआ है। उस काल में इतने पत्थरों को एक स्थान पर किस प्रकार एकत्रित किया गया होगा, यह मानवबुद्धि से परे की बात है।

ऊपरी तीन स्तूपों की संरचना, ज्यामितीय व समरूपता आश्चर्यजनक रूप से अद्वितीय है। सम्पूर्ण संरचना पत्थरों को आपस में जोड़ कर की गयी है। जोड़ने के लिए गारे,चूने अथवा कीलों का उपयोग नहीं किया गया है। स्तूपों में बने छिद्रों से बाहर झाँका जा सकता है। प्रत्येक स्तूप कमलपुष्प के आकार में खिला है।

जालीदार छिद्रों वाले प्रत्येक छिद्र में भगवान बुद्ध की प्रतिमा धर्मचक्र परिवर्तन मुद्रा में अवस्थित है। यह मुद्रा गतिमान धर्मचक्र की प्रतीक है। दुर्भाग्यवश बुद्ध की अधिकांश प्रतिमाएँ शीर्षरहित हैं। केवल धड़ बचा है। इन बौद्ध प्रतिमाओं के शीर्ष विश्व के अनेक संग्रहालयों अथवा व्यक्तिगत संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं।

ऊंचाई से देखने पर बोरोबुदूर एक स्तूप की भांति दिखाई देता है। इसका ज्यामितीय तलविन्यास ‘बौद्ध मंडला’ अथवा हिन्दू ‘श्री यंत्र’ की तरह दिखाई देता है। बोरोबुदूर का स्तूप अपनी विशालता में मिस्र के महान पिरामिड की याद दिलाता है। एक विद्वान ने तो बोरोबुदूर को पिरामिड के ऊपर निर्मित स्तूप बता डाला है।

वर्तमान में यह मंदिर विश्व में महायान बौद्ध धर्म का केंद्र माना जाता है। वस्तुतः यह विज्ञान तथा कला का अद्वितीय, अपूर्व सम्मिश्रण है। इसको देख कर मानवबुद्धि अचंभित हो जाती है।

भीतरी भाग-

मंदिर के भीतर 500 से अधिक शीर्ष रहित बौद्ध प्रतिमाएँ हैं। निचली मंज़िलों में पद्मासन में अवस्थित अधिकांश प्रतिमाएँ शीर्षरहित हैं। कुछ प्रतिमाएँ अन्य मुद्राओं में भी दिखाई देती हैं। ये मुद्राएँ हैं-

भूमि स्पर्श मुद्रा-

‘पृथ्वी साक्षी है’ अर्थात महाज्ञान की प्रतीक है।

वरद मुद्रा-

‘दान व परोपकार’ ( दानवीर बुद्ध की प्रतीक है)।

अभय मुद्रा-

‘ साहस व निर्भयता,’ संरक्षक बुद्ध की प्रतीक है।

ध्यान मुद्रा-

‘एकाग्रता व ध्यान’, समाधिस्थ भगवान बुद्ध

धर्मचक्र परिवर्तन मुद्रा-

यह गतिमान धर्मचक्र की प्रतीक है।

वितर्क मुद्रा-

‘तर्क एवं पुण्य’ की द्योतक है।

तीन लोकों का निरूपण-

मंदिर के तीन भाग प्रतीकात्मक रूप से ब्रह्मांड के तीन लोकों का निरूपण करते हैं। ये साधना के तीन चरणो को व्याख्यायित करते है: –

कामधातु-(इच्छाओं का संसार)-

यह मानव जीवन का निम्न स्तर है। इसमें मानव इच्छाओं के संसार में विचरण करता रहता है। निम्न वेदिकाओं की भित्तियों पर बोधिसत्वों की जातक कथाएँ उत्कीर्ण हैं।

रूपधातु-(रूपों का संसार)-

इच्छाओं को संयमित करने के बाद मानव इस स्तर पर पंहुच जाता है। इसको सगुण रूप माना गया है। इस स्तर की भित्तियों पर अंकित चित्र बुद्ध की इच्छा से अनिच्छा तक पंहुचने की यात्रा को दर्शाते हैं।

अरूप धातु (रूप रहित संसार)-

मूलभूत व विशुद्ध स्तर पर मानव व्यावहारिक वास्तविकता से ऊपर उठ कर ‘निर्वाण प्राप्ति’ कर लेता है। यह संत कबीर की भांति निर्गुण उपासना का प्रतीक है। इस स्तर के खंडों पर न कोई चित्र अंकित है न ही कोई शिल्पाकृति।

भित्तिचित्र-

बोरोबुदूर में भव्य अलंकरण देखने को मिलता है। अलंकृत भित्तियों को एक कतार में रख देने पर उनकी लम्बाई पाँच कि.मी होगी। मंदिर की भित्तियों तथा भीतरी भाग में कथा चित्र उत्कीर्ण हैं। चित्रों में मानव आकृति को त्रिभंग रूप में उकेरा गया है। इनमें वस्त्र, केश विन्यास, आभूषणों तथा पशुओं का भी सूक्ष्म चित्रण है। तत्कालीन जनसामान्य के जीवन को भी उकेरा गया है। भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बद्ध घटनाओं का चित्रण अतीव भाव प्रवणता से किया गया है। उनके जन्मस्थान, अश्व,बोधिवृक्ष इत्यादि के चित्र मनोहारी हैं। भारत की एलोरा गुफाओं की भांति ही संभवतः इन चित्रों में भी चटक रंगों का उपयोग किया गया हो।

किंवदंती है कि किसी समय बोरोबुदूर मंदिर झील के मध्य स्थित था और पानी पर तैरता हुआ दिखाई देता था। आधुनिक पुरातत्त्ववेताओं के मतानुसार हो सकता है कि किसी समय मंदिर के समीप कोई झील रही हो लेकिन मंदिर झील के मध्य स्थित नहीं था। जलनिकासी के लिए मगरमच्छ की आकृति का निकासमार्ग बना हुआ था।

बोरोबुदूर मंदिर तीन कतारबद्ध मंदिरों की शृंखला में से एक माना जाता है। अन्य दो मंदिर हैं- पवन तथा मेदुल। बोरोबुदूर मंदिर विश्व का सर्वाधिक विशाल बौद्ध मंदिर है। इसकी शिल्पाकृतियाँ सजीव व भाव प्रवण हैं। विशालता में अद्भुत रहस्यात्मकता है। इसके सृजनकर्ताओं ने भगवान बुद्ध की महानता से प्रभावित हो कर इस विशाल स्मारक के निर्माण करवाने का निर्णय लिया होगा। उन्होने पूरी आस्था के साथ आकार और भव्यता के दृष्टिकोण से इस अप्रतिम स्मारक का निर्माण करवाया।

इन्डोनेशिया सरकार तथा यूनेस्को के अथक प्रयासों के फलस्वरूप इस मंदिर का पुनर्निर्माण हो पाया। यूनेस्को ने इसको 1991ई में इसको विश्व विरासत घोषित कर दिया था। अब यह श्रद्धालुओं के लिए पुनः तीर्थस्थल तथा आस्था का केंद्र बन गया है। वर्ष में एक बार मई अथवा जून मास में पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु सिद्धार्थ गौतम का जन्म,निधन, बुद्ध शाक्यमुनि के रूप में ज्ञान प्राप्ति के उपलक्ष्य में ‘वैशाख’ उत्सव मनाते हैं।

मंदिर में दर्शन करने का सर्वोत्तम समय सूर्योदय का समय है। इसके लिए दर्शनार्थियों को रात्रि की निद्रा का परित्याग करना पड़ता है। मध्य जावा में स्थित बोरोबुदूर मंदिर सम्पूर्ण विश्व से सम्बद्ध है। इन्डोनेशिया की राजधानी जकारता के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विश्व के सभी देशों की विमान सेवाएँ उतरती हैं। बोरोबुदूर जोगजकारता से 40 कि.मी दूर है। यहाँ के हवाई अड्डे पर जकारता,बाली, सिंगापुर की विमान सेवाओं द्वारा पंहुचा जा सकता है। जोगजकारता में आवास,खान-पान की समुचित व्यवस्था है। बोरोबुदूर का भ्रमण करने के लिए पर्यटकों को सुविधापूर्वक आटो, टैक्सी मिल जाती हैं। बोरोबुदूर में भी रहने के लिए आवासगृह हैं। वहाँ जाने के लिए अगस्त से अक्तूबर के मध्य का समय उचित है। मंदिर के समीप ही स्मृति चिन्हों की दुकान है। इच्छा होने पर खरीदे जा सकते हैं। किसी भी पर्यटक के लिए विश्व के विशालतम, भव्य बौद्ध स्मारक ‘बोरोबुदूर’ अविस्मरणीय होगी।

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प्रमीला गुप्ता

पैरिस का ऐतिहासिक नोटरे-डेम-कैथेडरल-

दुनिया का खूबसूरत शहर,फ्रांस की राजधानी,पैरिस। सीन नदी के तट पर स्थित पैरिस शहर के केंद्र में है गोथिकस्थापत्यशैली में निर्मित विश्व विख्यात ‘नोटरे -डेम-कैथेडरल। 1991 ई में यूनेस्को ने अनेक अद्वितीयस संरचनाओं सहित पैरिस नगर को विश्व विरासत घोषित कर दिया था। नोटरे-डेम-कैथेडरल भी उन अद्वितीय संरचनाओं में से एक है। प्रारम्भ में इस स्थान पर रोमनवासियों द्वारा ज्यूपिटर का मंदिर था। उसके बाद यहाँ पर क्रिश्चियन गिरजाघर का निर्माण हुआ। तत्पश्चात 528 ई में चाइल्डबर्ट ने यहाँ पर सेंट एंटीयन का चर्च निर्मित करवाया।

पैरिस नगर नित्यप्रति विकसित हो रहा था,जनसंख्या में वृद्धि हो रही थी। तब पैरिस के बिशप मारिस-द-सली ने ‘वर्जिन मेरी’ को समर्पित विशाल नए चर्च के निर्माण की योजना बनाई। चर्च का निर्माणकार्य 1163 ई में प्रारम्भ हो गया था लेकिन इसको पूरा होने में 180 वर्ष लग गए। 1345 ई में निर्माण कार्य पूरा हुआ। उस अज्ञानता, अशिक्षा के समय में भी कैथेडरल के प्रवेशद्वारों पर तथा रंगीन काँच की खिड़कियों पर बाइबल से उद्धृत चित्र व आख्यान उत्कीर्ण हैं।

1183 ई में कैथेडरल में गायक मंडली के लिए बैठने का कक्ष बन जाने के बाद मध्य भाग का निर्माण कार्य शुरू हुआ जो 1208 ई में पूरा हुआ। पश्चिम के बाहरी भाग तथा गुंबदों का निर्माण 1225-1250 ई के बीच पूरा हुआ। 1235-50 के मध्य केंद्र में अन्य कई गिरजाघर निर्मित किए गए। 1250-67 ई के बीच जीन-द- चेलेस तथा पियरे-द- मोंट्रियल ने गलियारों तथा 1296-1330 के मध्य पियरे-द-चेलेस व जीन रेवी ने पूर्वी छोर का मेहराबदार भाग निर्मित करवाया। भित्तियों पर प्रारम्भिक गोथिक शैली में महीन नक्काशी उत्कीर्ण है।

इतिहास-

नोटरे-डेम कैथेडरल का इतिहास सदियों पुराना तथा संघर्षपूर्ण है। प्रारम्भ में धर्मयुद्ध पर प्रस्थान करने से पहले योद्धा यहाँ पर प्रार्थना करने के लिए आते थे। कैथेडरल के भीतर मधुर ध्वन्यात्मक संगीत का जन्म हुआ। फ्रेंच क्रान्ति के समय क्रांतिकारियों ने पूरे फ्रांस के कैथेडरलों के साथ नोटरे-डेम को भी तहस-नहस कर डाला। पश्चिम द्वार के ऊपर निर्मित संतों की प्रतिमाओं को जनसमूह ने सम्राटों की प्रतिमाएँ समझ कर खंडित कर डाला। कैथेडरल की बहुमूल्य वस्तुओं को या तो नष्ट कर दिया या फिर लूट लिया। केवल विशाल घंटे ही संरक्षित रहे। क्रांतिकारियों ने पहले तो कैथेडरल में तर्क सम्प्रदाय की स्थापना की बाद में इसको ईश्वर को समर्पित कर दिया। नेपोलियन प्रथम ने इसी कैथेडरल में राजसत्ता को चर्च के ऊपर अधिमान्यता प्रदान की । अपने सिर पर स्वयं ही सम्राट का ताज रखा,उसके बाद अपनी पत्नी, साम्राज्ञी को ताज पहनाया। उस समय यह कार्य आर्कबिशप करता था। उस अवसर पर उपस्थित पोप पायस पंचम ने भी इस पर किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की। 18वीं सदी के युवा साहित्यकारों ने इन मध्यकालीन संरचनाओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखा। यही नहीं कैथेडरल में रंगीन काँच के स्थान पर सादे काँच के शीशे लगवा दिये। 19वीं सदी के रोमांटिक कलाकारों, साहित्यकारों ने इस भव्य संरचना को नए दृष्टिकोण से देखा। 19वीं सदी के विक्टर ह्यूगो तथा इंग्रेस जैसे प्रख्यात साहित्यकारों व कलाकारों ने कैथेडरल की दुर्दशा के प्रति जनसामान्य का ध्यान आकर्षित किया तथा इसके संरक्षण के प्रति जागरूकता उत्पन्न की। 1844 ई में कैथेडरल का पुनर्निर्माण कार्य आरंभ हुआ जो तीन साल तक चला। यूजेन एमेन्यूल, वायलट-ल-डक ने केंद्र के पूर्वी भाग की खिड़कियों को पुनर्निर्मित करवाया, पश्चिमी दिशा के बाहरी भाग की ध्वस्त प्रतिमाओं का भी पुनर्निर्माण करवाया।

गुलाबी रंग की खिड़कियों तथा प्रतिमाओं की पुनर्स्थापना के बाद वायलट-ल-डक ने अपनी वैज्ञानिक सोच तथा सृजनशीलता के आधार पर नोटरे-डेम के ऊपर गुंबद बनवाए, पवित्र बर्तनों को रखने के लिए भी स्थान बनवाया। 19वीं शताब्दी में बैरन हाउसमन ने कैथेडरल की मनमोहक दृश्यावली को अवरुद्ध करने वाली आसपास की इमारतों को तुड़वा दिया।

1871 ई में विप्लवकारियों ने कैथेडरल में आग लगा दी। भीतर रखी कुर्सियों का ढेर आग में जल कर राख़ हो गया लेकिन कैथेडरल को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पंहुचा। 1768 ई में भूगोलविदों ने निर्णय लिया कि फ्रांस के किसी भी स्थान की दूरी का मापन केंद्र नोटरे-डेम कैथेडरल होगा। 176 वर्ष बाद द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के उपरांत फ्रांस स्वतंत्र हुआ। तब वापिस लौटने पर जनरल-द- गाल ने कैथेडरल में धन्यवादस्वरूप प्रार्थना की थी। नोटरे-डेम आज भी फ्रांस का केंद्रस्थल माना जाता है।

स्थापत्य कला-

इतिहास की अपेक्षा कैथेडरल की स्थापत्यकला अधिक दर्शनीय व मुग्धकारी है। विश्व के व्यस्ततम नगर पैरिस में स्थित होने के कारण यह पर्यटकों का सर्वाधिक लोकप्रिय आकर्षण है। किसी अन्य कैथेडरल की तुलना में यहाँ पर अधिक पर्यटक आते हैं।

नोटरे-डेम का बाहरी अलंकृत, नक्काशीदार भाग विश्व विख्यात एवं लोकप्रिय है। इसका चित्र अधिकांश पोस्टकार्डों व ट्रैवल गाइड्स पर मुद्रित है। इसका कारण तत्कालीन स्थापत्यशैली में दिखाई न देने वाला बाहरी भाग में डिजाइन की समरूपता तथा उत्कृष्ट शिल्प है।

विशाल प्लाज़ा-

19वीं सदी में हाउसमन द्वारा डिजाइन किए गए नोटरे-डेम के विशाल प्लाज़ा से कैथेडरल के बाहरी तीन भव्य नक्काशीदार प्रवेश द्वार दिखाई देते हैं। यद्यपि इन का निर्माण 13 वीं शताब्दी में हो चुका था तथापि बाद में अधिकांश प्रतिमाएँ व नक्काशी नष्ट हो गयी थी। बाद में उन का पुनर्निर्माण किया गया। प्रवेशद्वार पूर्णरूप से सममित (सिमीट्रिकल) नहीं हैं। मध्यकालीन स्थापत्यकला में सममिति का होना अनिवार्य नहीं था।

बायाँ प्रवेशद्वार-

इस प्रवेशद्वार पर वर्जिन मेरी के जीवन से सम्बद्ध चित्रों के साथ-साथ राज्याभिषेक का चित्र व खगोलीय कैलेंडर भी चित्रित है।

केंद्र का प्रवेशद्वार-

इस द्वार पर अंतिम निर्णय (Last Judgement) को सीधे अलंकृत,नक्काशीदार चित्रों में उकेरा गया है। पहले तथा दूसरे पैनल पर पुनर्जीवित होने,अंतिम निर्णय, प्रभु यीशु का अन्य देवदूतों के साथ के चित्र उत्कीर्ण हैं। सिंहासन पर बैठे प्रभु का चित्र अत्यधिक भावपूर्ण है।

दायाँ प्रवेशद्वार-

यहाँ पर सेंट एंटीयन का चित्र उत्कीगर्ण है। इसके अतिरिक्त 12वीं सदी की सर्वोत्कृष्ट प्रतिमाओं का चित्रण है। इन में वर्जिन मेरी का अपने शिशु यीशु को गोद में लेकर सिंहासन बैठे हुए भी चित्रण है।

गैलेरी-

तीनों प्रवेशद्वारों के ऊपर एक गैलेरी में जुडाई तथा इज़राइल के 28 सम्राटों की एक कतार में प्रतिमाएँ स्थित हैं। ये मूल कृतियों की प्रतिकृतियाँ हैं। मूल कृतियाँ क्रान्ति के समय खंडित कर दी गयी थी।

पश्चिम की रोज़ विंडोज़-

कैथेडरल के पीछे पश्चिम में रोज़ विंडोज़ हैं। इन का व्यास 10 मीटर है। उस समय ये विंडोज़ अपनी तरह की विशिष्ट विंडोज़ थी। समीप जाने पर इन के बाहरी किनारे पर बाइबल से उद्धृत आदम और ईव के चित्र दिखाई देते हैं।

बाहरी भाग का ऊपरी हिस्सा-

गुंबदों से पहले एक विशाल गैलेरी है। यह दोनों गुंबदों को आधार से जोड़ती है। इस गैलेरी में भयावह दैत्य,दैत्याकार पक्षी दिखाई देते हैं। ये नीचे से नहीं दिखाई देते हैं। नोटरे-डेम के चित्ताकर्षक,अलंकृत गुंबद विश्व प्रसिद्ध हैं। इसका श्रेय 19वीं सदी के कालजयी फ्रेंच साहित्यकार विक्टर ह्यूगो को जाता है। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘The Hunchback of Notre-dem)’ नोटरे-डेम का कुबड़ा) का मुख्य पात्र कुबड़ा क्वासिमिडो कैथेडरल के दक्षिणी गुंबद पर रहता है। ये गुंबद 68 मीटर ऊंचे हैं। यहाँ से सीन नदी तथा पैरिस नगर की मुग्धकारी दृश्यावली दिखाई देती है। गुंबद के शिखर तक जाने के लिए 402 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।

उत्तरी, दक्षिणी व पिछला भाग-

प्रायः पर्यटक इस भाग की अनदेखी कर देते हैं। वास्तव में कैथेडरल का उत्तरी, दक्षिणी तथा पिछला भाग भी बेहद खूबसूरत है। यहाँ पर 13वीं सदी में निर्मित वर्जिन मेरी की प्रतिमा स्थित है। दुर्भाग्यवश उनकी गोद में बैठे प्रभु यीशु की प्रतिमा 18वीं सदी में खंडित कर दी गयी थी तथा उसका पुनर्निर्माण नहीं हो पाया। पिछला भाग भी निश्चित रूप से बाहरी भाग की तरह चित्ताकर्षक है। यहाँ पर उड़ते पक्षियों की आकृतियाँ देखते ही बनती हैं। मुख्य बाहरी भाग के दायीं ओर सेंट एंटीयन चर्च का प्रवेशद्वार है।

आंतरिक भाग –

मध्यकालीन वास्तुकार प्रायः स्वर्ग की तुलना में सांसारिक नश्वरता को अपनी संरचनाओं में प्रतिबिम्बित करते थे। नोटरे-डेम में भी भौतिकता तथा पारलौकिकता का चित्रण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। विशाल सभागार, नक्काशीदार छतें,उनमें रंगीन काँच से छन कर आता अलौकिक प्रकाश मानवीय तथा दैवी ऊर्जा का अपूर्व सम्मिश्रण है। कैथेडरल की ऊपरी मंज़िलों पर पंहुचने का कोई मार्ग नहीं है। नीचे से ही ऊपर के अलौलिक सौंदर्य का आनंद लिया जा सकता है।

रंगीन काँच की तीन रोज़ विंडोज़-

ये कैथेडरल के आंतरिक भाग की अद्वितीय आकर्षण हैं। दो खिड़कियाँ क्रूसागार भाग में हैं। उत्तर की रोज़ विंडो का निर्माणकाल 13वीं सदी है। यह खिड़की सर्वाधिक मनोहारी है। इसमें वर्जिन मेरी के चारों ओर पुरातन टेस्टामेंट से उद्धृत चित्र उत्कीर्ण हैं। दक्षिण की रोज़ विंडो में संतों तथा देवदूतों से घिरे प्रभु यीशु का चित्र है। रंगीन काँच की ये खिड़कियाँ 1965 ई से कैथेडरल को शोभायमान कर रही हैं।

1990 ई में नोटरे-डेम के वाद्य यंत्रों को ठीक किया गया। इन की गणना फ्रांस के सर्वाधिक विशाल वाद्य यंत्रों में होती है। प्रार्थना सभा में इन का मधुर संगीत तन-मन के साथ-साथ आत्मा को तृप्त कर देता है। यहाँ पर वर्जिन मेरी, यीशु की प्रतिमा के साथ अनेक संतों के स्मारक भी स्थित हैं।

कोषागार-

कैथेडरल के पिछवाड़े में कोषागार है। इसमें बहुमूल्य वस्तुएँ, सोने व अन्य कीमती धातुओं से निर्मित मुकुट तथा सलीबें संरक्षित हैं।

म्यूज़ियम-

1960ई तक कैथेडरल के सामने इमारतों का जमावड़ा था।इन के कारण कैथेडरल की दृश्यावली अवरुद्ध होती थी। अंततः इन इमारतों को ढहा दिया गया। खुदाई में गैलो-रोमन काल से लेकर 19वीं सदी तक के पुरातत्त्वशेष प्राप्त हुए हैं। 1965 ई में उत्खनन कार्य आरंभ हुआ था। इन पुरातत्त्वशेषों को संग्रहीत करने के लिए कैथेडरल के सामने पुरातात्त्विक संग्रहालय निर्मित किया गया। यह विश्व में अपनी तरह की विशालतम संरचना है। प्लाज़ा के फर्श पर पीतल की पट्टियाँ लगी हुई हैं। इनसे उन स्थानों का पता चलता है जहां पर इमारतों को ढहाया गया था।

गिफ्ट शॉप –

कैथेडरल के प्रमुख हाल में गिफ्ट शॉप है। यहाँ पर कैथेडरल के स्मृतिचिन्ह मिलते हैं।

नोटरे-डेम कैथेडरल फ्रांस की राजधानी पैरिस में स्थित है। पैरिस दुनिया का खूबसूरत शहर है तथा पूरे विश्व के साथ हवाई मार्ग से जुड़ा है। हर साल लाखों पर्यटक यहाँ पर नोटरे-डेम कैथेडरल, एफिल टावर जैसी विशिष्ट कलात्मक संरचनाओं को देखने के लिए आते हैं।

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प्रमीला गुप्ता

ऐतिहासिक इस्तांबुल

इस्तांबुल अथवा कान्स्टेण्टिपोल के नाम से कल्पना में उभरने लगती है मस्जिदों,मीनारों, बोसपोरस, जलडमरू, बैले नर्तकियों की छवि। विमान से इस्तांबुल के विशाल अतातुर्क एयरपोर्ट पर उतरने के बाद यह छवि धूमिल पड़ जाती है। भव्य अतातुर्क एयरपोर्ट के सामने यूरोप के कुछ एयरपोर्ट भी फीके दिखाई देंगे। इस्तांबुल के आँचल में सिमटे हैं पूर्वी तथा पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति के अनेक रहस्य।

एशिया तथा यूरोप के दो विशाल महाद्वीपों के मध्य स्थित इस्तांबुल विश्व का एकमात्र शहर है। 657 बीसी में ग्रीक निर्माता बायजन्स ने इस शहर की आधारशिला रखी थी व अपने नाम पर शहर का नाम ‘बायज़ेंटियम’ रखा। दो महाद्वीपों के बीच स्थित होने के कारण उस समय व्यापारिक दृष्टिकोण से यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था। दोनों द्वीपों के व्यापारी इस शहर से हो कर गुजरते,यहाँ पर ठहरते तथा स्थानीय लोगों के साथ भी व्यापार करते थे। परिणामस्वरूप यह दिनोंदिन समृद्ध होता चला गया और शक्तिसम्पन्न देशों की आँखों की किरकिरी बन गया। 330 ई में कान्स्टेंटाइन दी ग्रेट ने इस शहर पर आधिपत्य कर लिया और इसे रोमन साम्राज्य की राजधानी बना लिया। 1926 तक यह शहर पाश्चात्य जगत में कान्स्टेण्टिपोल के नाम से ही जाना जाता था। वर्तमान में यह पुरातन ऐतिहासिक शहर विश्व विजेताओं की अपेक्षा सम्पूर्ण विश्व के पर्यटकों का लोकप्रिय भ्रमण स्थल है। सागरतट पर बसा यह शहर सामान्य तथा सम्पन्न पर्यटकों का समान रूप से आकर्षण का केंद्र है। इसके ऐतिहासिक महत्त्व तथा विशिष्ट स्थापत्य कला के कारण यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने 1985 ई में विश्व विरासत के रूप में इसको मान्यता प्रदान कर दी थी।

अहमत स्क्वेयर

पुरातन इस्तांबुल सुल्तान अहमत स्क्वेयर के इर्द-गिर्द बसा है। यहाँ की गलियों में लोगों को रेहड़ियों पर सामान बेचते, मजदूरों को माल ढोते और बच्चों को जूते पालिश करते देख यकायक दिल्ली के चाँदनी चौक की याद आ जाती है। प्रसिद्ध ऐतिहासिक, भव्य स्मारक व दर्शनीय स्थल ‘तोपकापी पैलेस’, ‘अया सोफिया’, ‘नीली मस्जिद’ भी सुल्तान अहमत स्क्वेयर में स्थित है। समीप ही है पाँच सौ साल पुराना ‘ग्रांड बाज़ार’।

तोपकापी पैलेस

पिछले साढ़े पाँच सौ वर्षों से तोपकापी पैलेस में ओटोमन साम्राज्य का दिल धड़कता है। 1453 ई में कान्स्टेण्टिपोल पर अधिकार करने के बाद सुल्तान अहमत द्वितीय ने शहर के बीच तोपकापी पैलेस का निर्माण करवाया था। चार विशाल प्रांगणों के बीच निर्मित है पैलेस। स्वयं को ईश्वरीय दूत समझने वाले सुल्तान इस पैलेस में अपनी अगणित पत्नियों के साथ रहते थे। उनके लिए पृथक आलीशान अंतःपुर बने हुए थे।

1924 ई में तुर्की को गणतन्त्र राष्ट्र घोषित करने के बाद पैलेस को म्यूज़ियम में परिवर्तित कर दिया गया था। यहाँ पर तुर्की सभ्यता,संस्कृति के प्राचीनतम स्मृतिचिन्ह संरक्षित हैं। सुल्तानों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले बहुमूल्य रत्नजड़ित वस्त्र, आभूषण, सिंहासन, शिल्पाकृतियाँ देख कर आँखें चौंधिया जाती हैं। सभी वस्तुओं को तत्कालीन पृष्ठभूमि में सजा कर रखा हुआ है।

सुंदर इजनिक टाइलों से निर्मित हैं कैफे। तुर्की भाषा में ‘कैफे’ का अर्थ है-पिंजरा। राजगद्दी के लिए विद्रोह को रोकने के विचार से राजकुमारों को बाल्यकाल से ही इस ‘पिंजरे’ में बंद कर दिया जाता था। मूक-बधिर दास उनकी सेवा करते थे। दो साल की नन्ही उम्र से ही इस पिंजरे में रहने के कारण कई बार राजकुमार राजगद्दी पर बैठने की आयु तक अपनी बोलने की शक्ति ही खो बैठते थे।

सुल्तान महमूद द्वितीय विद्वान और सभ्य था। उसको बागबानी का भी बहुत शौक था। पैलेस के एक प्रांगण में दुर्लभ प्रजातियों के वृक्ष, लताएँ और पुष्पों के पौधे लगवाए गए थे। ट्यूलिप पुष्प तो इस उद्यान की शोभा थे। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि हालैण्ड में ट्यूलिप का प्रवेश यहीं से हुआ था। हालैण्ड का क्यूकेनहाफ ट्यूलिप गार्डन विश्व का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन है। 18वीं सदी में सुल्तान अहमद तृतीय इस्तांबुल में ट्यूलिप फेस्टिवल का आयोजन करवाता था। बिजली तो उस समय थी नहीं। कल्पना कीजिये कि रात्रि के समय लालटेनों की रोशनी में जगमगाते खूबसूरत ट्यूलिप और कछुओं की पीठ पर जलती मोमबत्तियों के प्रकाश में उद्यान की शोभा कितनी मनोहारी होती होगी!

तोपकापी म्यूज़ियम में रखा हुआ है विश्व प्रसिद्ध ‘कासिकी’ हीरा। इसको ‘स्पूनमेकर’स’ डायमंड भी कहते हैं। इस हीरे के चारों ओर छोटे-छोटे हीरे जड़े हैं। इस हीरे के साथ अनेक किंवदंतियाँ जुड़ी हैं। एक किंवदंती के अनुसार 1669 ई में एक तुर्की मछुआरे को यह कूड़े के ढेर में मिला था। कीमत से अनजान उसने इसको एक चम्मच बनाने वाले को लकड़ी के तीन चम्मचों के बदले में बेच दिया। शायद इसीलिए इसका नाम ‘स्पून मेकर’स’ डायमंड पड़ गया हो।

हीरे-जवाहरात जड़ित, स्वर्णमंडित संगीतमय बॉक्स का निर्माण स्थान भारत है। 18 वीं सदी में यह बॉक्स तत्कालीन तुर्की सम्राट को उपहारस्वरूप दिया गया था। इसमें आज भी भारतीय शास्त्रीय लोक नृत्यों के संगीत की धुनें सुनी जा सकती हैं।

1964 ई में निर्मित प्रख्यात हालीवुड फिल्म तोपकापी का मशहूर डैगर 1747 ई में सुल्तान महमूद प्रथम ने एशिया के बादशाह को भेंट में देने के लिए तैयार करवाया था। दुर्भाग्यवश उसको देने से पहले ही बादशाह की हत्या कर दी गयी। बाद में सुल्तान महमूद ने वह डैगर अपने ही पास रख लिया।

रूबी जड़ित भव्य स्वर्णिम सिंहासन देख कर आँखें चौंधिया जाती हैं। किंवदंती के अनुसार यह राजसिंहासन नादिरशाह ने सुल्तान महमत को भेंट में दिया था।

अया सोफिया/ हेगीया सोफिया

भव्य तोपकापी पैलेस के बाद अन्य दर्शनीय स्थल है-अया सोफिया/ हेगीया सोफिया। यह तुर्की के समग्र इतिहास का साक्षी है।537 ई में ईसाई सम्राट जास्टीनियम प्रथम ने इस विशाल चर्च का निर्माण करवाया था। इसके गुंबद का घेरा 100फीट और ऊंचाई 200 फीट है। इस चर्च का कार्यभार संभालने के लिए 60 से 80 पादरियों और 76 से 100 द्वारपालों की ज़रूरत पड़ती थी। प्रभु यीशु मसीह के जीवन के अंतिम दिन को दर्शाते भित्तिचित्र देख कर दर्शकों की आँखें नम हो जाती हैं। कई सदियों तक इसकी छत विश्व की विश्व की विशालतम छत मानी जाती रही। गुंबद की खिड़कियों से छन कर आता सूर्य का प्रकाश इमारत के कण-कण को सुनहरे रंग में रंग देता है। दर्शकों का हृदय भी उजास और उष्णता से भर जाता है

ओटोमन साम्राज्य की स्थापना के तुरंत बाद यह चर्च मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था। गुंबद के चारों ओर चार मीनारें बनवा दी गयी। धर्म निरपेक्ष गणतन्त्र राष्ट्र बनने के उपरांत कमाल अतातुर्क ने घोषणा कर दी कि यह न चर्च होगा न ही मस्जिद बल्कि सर्वधर्म समन्वय की भावना को दर्शाता एक सेक्युलर म्यूज़ियम होगा। अपनी विशिष्ट स्थापत्य कला, भव्य भित्तिचित्रों व शिल्पाकृतियों के कारण यह सम्पूर्ण विश्व के पर्यटकों का लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है।

नीली मस्जिद-

ओटोमन बादशाह सुल्तान अहमद ने भव्य अया सोफिया/ हेगीया सोफिया से प्रभावित हो कर उससे श्रेष्ठ मस्जिद बनवाने का फैसला किया। नीली मस्जिद उसी का परिणाम है। सामान्यतः मस्जिद के ऊपर चार मीनारें होती हैं लेकिन नीली मस्जिद के ऊपर छह मीनारें हैं। रंगीन काँच की खिड़कियाँ, अनेक गुंबद, छह मीनारें तथा आसपास का शांत वातावरण अतीव सुखद है। भीतरी भाग 20,000 पुरानी नीली टाइलों से अलंकृत होने के कारण यह नीली मस्जिद के नाम से मशहूर हो गयी। 16वीं सदी में उकेरे गए चित्ताकर्षक भित्तिचित्र इसके सौंदर्य में चार चाँद लगा देते हैं। दोपहर की नमाज़ अदा करने के बाद मस्जिद से बाहर आती नमाज़ियों की अपार भीड़ देखते ही बनती है। बाउंड्रीवाल के बाहर सुल्तान अहमत, उनकी पत्नी और तीन बेटों की कब्रगाहें हैं। मस्जिद के पिछवाड़े में है ‘वक्फ कार्पेट म्यूज़ियम’ इसमें तुर्की के प्राचीन कालीन रखे हुए हैं ।

हिप्पोड्रोम

समीप ही है हिप्पोड्रोम। बाइजेंटाइन तथा रोमन काल की ही भांति वर्तमान में भी यहाँ पर मनोरंजन के लिए रथों तथा घुड़दौड़ प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।

ग्रांड बाज़ार –

सुल्तान अहमत स्क्वेयर में 500 वर्ष पुराना विशाल ग्रांड बाज़ार तुर्की के इतिहास तथा धर्म के बीच एक शानदार व्यावसायिक केंद्र है। इसमें 4,000 दुकाने हैं। बिजली के आविष्कार से पहले यहाँ की ऊंची छतों पर कैरोसीन के लैम्प लटकते थे। हैरानी की बात नहीं कि इस कारण से बाज़ार में कई बार आग लगी और कई बार इसका पुनर्निर्माण करवाया गया। बाज़ार में आभूषण,फर्नीचर, कपड़ों और तांबे के सामान की दुकानों के साथ-साथ रेस्टौरेंट और फव्वारे भी हैं। तुर्की में एक मशहूर कहावत है कि खरीददार एक सिरे से बाज़ार में खाली हाथ घुसता है तो दूसरे सिरे से बीवी,दहेज,फर्नीचर से भरा घर और ताउम्र अदा न होने वाला कर्ज़ लेकर बाहर निकलता है।

तुर्की वासी अपने आप को योद्धा और प्रशासक कहलवाना पसंद करते हैं। दूकानदारी में उनकी विशेष रुचि नहीं है। इसलिए अधिकांश दुकानदार यहूदी,ग्रीक तथा आर्मेनियन्स हैं। सभी दूकानदारों के व्यापार करने के तौर-तरीके एक जैसे हैं।

ग्रांड बाज़ार के पीछे एक हज़ार साल पुरानी गलियों में शिल्पकार रहते हैं। इन के द्वारा निर्मित कलाकृतियाँ, आभूषणों की भारी मांग रहती है। समोवर शिल्पकार किसी भी असली एंटिक की प्रतिकृति एक घंटे में तैयार कर देते हैं। चर्मकार लिनन की तरह मुलायम चमड़े का सामान तैयार करने में माहिर हैं तो सुनार दुल्हनों की बाँहों पर सजाने के लिए खूबसूरत ब्रेसलेट बनाते हैं। जितना अधिक धनी सम्पन्न परिवार होगा,दुल्हन की बाँहों पर उतने ही ज़्यादा ब्रेसलेट सज़े दिखाई देंगे।

मसाला बाज़ार (स्पाइस मार्केट)-

तीन सौ साल पुराने मिस्र मार्केट को मसाला बाज़ार भी कहा जाता है। यहाँ की तीन चीज़ें बहुत मशहूर हैं-भुनी मकई, सूखी सब्जियाँ और मसाले। जगह-जगह कालीन की दुकानें हैं। इन में हर कीमत के बढ़िया और खूबसूरत कालीन मिलते हैं। मसाला बाज़ार में केसर से लेकर शक्तिवर्धक जड़ी-बूटियाँ मिलती हैं। एक दुकान है जो 1777ई से मिठाइयाँ बेच रही है। उस समय अलिमुहिद्दीन हाजी बेकार ने एक मिठाई तैयार की थी जो हज की लम्बीयात्रा में खराब नहीं होती थी। जल्दी ही यह मिठाई पूरी दुनिया में मशहूर हो गयी। समय के साथ इसको बनाने की विधि में थोड़ा हेर-फेर अवश्य हो गया है लेकिन दुकान आज भी उसी स्थान पर मौजूद है।

सुल्तान अहमत स्क्वेयर में बजट के अनुरूप सस्ते,सुविधाजनक छोटे होटल हैं। अधिकांश होटल निजी आवासगृहों में हैं,इन का संचालन परिवार का मुखिया करता है। इन में एयरपोर्ट से रिसीव करने से ले कर घूमने-फिरने, विशिष्ट स्थानों पर खान-पान तथा ग्रांड बाज़ार में खरीददारी करने की व्यवस्था रहती है। एक दिक्कत है। नहाने के लिए इन में बाथरूम बहुत छोटे होते हैं लेकिन एक आकर्षण इस कमी को पूरा कर देता है। प्रायः सभी होटलों में टेरेस गार्डन हैं। वहाँ से सागर तथा भव्य दर्शनीय इमारतों का चित्ताकर्षक दृश्य दिखाई देता है।

सुल्तान अहमत स्क्वेयर से छह कि.मी दूर तकसीम है। यहाँ पुरानी मस्जिदों के बीच नयी ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी हैं। होटल के कमरे की खिड़की से बोसपोरस और पुराने इस्तांबुल की स्काईलाइन दिखाई देती है। बोसपोरस पर निर्मित पुल एशिया तथा यूरोप के महाद्वीपों को जोड़ता है। सागर तट पर इस्तांबुल की सबसे ज़्यादा महंगी प्रापर्टी है।

यहाँ का बैले नृत्य सामान्य नृत्य नहीं है अपितु नृत्यकला की विशिष्ट शैली है। इसमें पारंगत होने के लिए विशिष्ट साधना करनी पड़ती है।

कानून,व्यवस्था, साफ-सफाई की हालत सामान्य है। बसें,ट्राम खचाखच भरी रहती हैं,सवारियाँ बाहर लटकी रहती हैं। बेफिक्र हो कर सैर-सपाटा, मौज-मस्ती और खरीददारी की जा सकती है। सूरज ढलने पर पूरा शहर बिजली की रोशनी में सोने की तरह दमकने लगता है। इतिहास के आईने में झिलमिल करता इस्तांबुल वास्तव में सम्पूर्ण विश्व की अनुपम धरोहर है।

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प्रमीला गुप्ता

मिस्र के पिरामिड

विश्व इतिहास आश्चर्यजनक रहस्यों से भरा पड़ा है। उनमें मिस्र के पिरामिड आज भी मानव मस्तिष्क के लिए रहस्यमय पहेली बने हुए हैं। उनकी संरचना के रहस्य को अभी तक सुलझाया नहीं जा सका है।

पिरामिड निर्माण में निहित भावना-

एक समय मिस्र की सभ्यता की गणना विश्व की सर्वाधिक शक्तिसंपन्न और वैभवशाली सभ्यताओं में होती थी। मिस्र के तीसरे राजवंश का सम्राट जोसर प्रजाप्रेमी था। प्रजा भी सम्राट का सम्मान ईश्वर के चुने हुए प्रतिनिधि के रूप में करती थी। सम्राट जोसर की मृत्यु के उपरांत मिस्रवासियों ने अपने प्रिय सम्राट की आत्मा को शरीर के साथ संरक्षित रखने के विचार से दफनाने से पहले लेप लगा कर शरीर को संरक्षित कर दिया। शव के साथ खाने-पीने की सामग्री,वस्त्र, आभूषण,वाद्ययंत्र, शस्त्र-अस्त्र, यहाँ तक कि सेवक-सेविकाओं को भी दफना दिया गया। 263 ई पू के आसपास जोसर की कब्रगाह के रूप में मिस्र के सबसे पिरामिड का निर्माण हुआ था। यह सकारा में स्थित है। उसके बाद तीसरे और चौथे राजवंश के सम्राटों ने पिरामिड निर्माण की परम्परा को आगे बढ़ाया।

पिरामिडों का देश मिस्र-

आरंभ में मिस्र की राजधानी मेम्फीस थी। मेम्फी स के पुरातत्त्वशेष वर्तमान राजधानी काहिरा के 40 कि.मी दक्षिण में नील नदी के पश्चिमी तट पर अवस्थित हैं। नील नदी के पश्चिमी तट पर एक शाही कब्रिस्तान है। यहाँ पर सम्राटों द्वारा निर्मित 138 पिरामिड हैं। संभवतः इसीलिए मिस्र को ‘पिरामिडों का देश’ कहा जाता है। चोर-लुटेरे उनके भीतर रखे बहुमूल्य सामान को चुरा न लें इसलिए पिरामिडों की संरचना अतीव जटिल होती थी। प्रायः सम्राट अपने जीवनकाल में ही एक भव्य, विशाल पिरामिड का निर्माण करवा देता था। शव को पिरामिड के केंद्र में दफनाया जाता था।

मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक सी बात है कि जब मृत सम्राटों की कब्रगाह (पिरामिड) इतनी भव्य है तब उनके राजप्रासाद इन स्मारकस्थलों से अधिक वैभवसम्पन्न और विशाल होंगे। उन भव्य स्थानों के अवशेष तो आज कहीं भी देखने को नहीं मिलते जब कि ये प्रस्तर स्मारक आज भी विद्यमान हैं।

गिज़ा का ग्रेट पिरामिड-

जो भी कारण हो यह एक तथ्य है कि ये पिरामिड मिस्र के गौरवशाली अतीत के साक्षी हैं। वैसे तो मेम्फीस में 138 पिरामिड तथा काहिरा के उपनगर गिजा में तीन पिरामिड हैं लेकिन इन में से ‘दी ग्रेट पिरामिड’ ही सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र है। यह विश्व के प्राचीन सात अजूबों में से एक है। अन्य छह कालप्रवाह में क्षतिग्रस्त हो गए लेकिन यह आज भी उन्नत मस्तक के साथ खड़ा है। 1979ई में यूनेस्को ने मेम्फीस के पुरातत्त्वशेषों सहित इन पिरामिडों को भी विश्व धरोहर घोषित कर दिया था।

चतुर्थ राजवंश के तीन सम्राटों खुफू, खफ्रे, मे-कुरे ने गिज़ा में इन पिरामिडों का निर्माण करवाया था। इन तीनों में खुफू का पिरामिड सबसे बड़ा है। इसको ‘दी ग्रेट पिरामिड’ कहा जाता है। ‘दी ग्रेट पिरामिड’ 450 फीट ऊंचा है। 4300 वर्षों तक यह विश्व की सर्वोच्च संरचना थी। 19वीं शताब्दी में उसका यह रिकार्ड टूट गया। इसका आधार 13 एकड़ भूमि पर फैला है जो लगभग 16 फुटबाल के मैदानों के बराबर है।इसके निर्माण में 25 लाख चूना-पत्थरों के खंडों का उपयोग हुआ है। पुरातत्त्वविशेषज्ञों के अनुसार 2560 ई पू मिस्र के सम्राट खुफू ने स्मारक के रूप में इसका निर्माण करवाया था तथा इसके निर्माण में लगभग 23 वर्ष का समय लग गया था। यह पिरामिड इतनी परिशुद्धता से निर्मित है कि आधुनिक विकसित तकनीक द्वारा भी ऐसी संरचना का निर्माण संभव नहीं है।

पिरामिड की संरचना-

गिज़ा का यह ग्रेट पिरामिड वर्गाकार है।नाप-जोख के लिए लेजर किरणों जैसे उपकरणों का आविष्कार होने से पहले वैज्ञानिक सूक्ष्म सिमिट्रीज़ (सममिति) का पता लगाने में असमर्थ थे लेकिन इसके निर्माण में ज्यामितीय शुद्धता का पूरा ध्यान रखा गया है। चारों भुजाएँ लगभग बराबर हैं। उन के माप में केवल कुछ से.मी का ही अंतर है जो इसकी विशालता को देखते हुए नगण्य है। पिरामिड के चारों कोने समकोण हैं। मूलरूप में इसकी ऊंचाई 146 मीटर थी लेकिन समय के अंतराल में अब केवल 137 ही रह गयी है।

ग्रेट पिरामिड का प्रवेशद्वार उत्तरी दिशा में भूतल से पाँच मीटर ऊपर है। प्रवेशद्वार अड़तालीस स्तंभों पर आधारित था। भीतर प्रवेश करने पर पहले रानी का शावकक्ष और फिर राजा का शवकक्ष आता है। राजा के शवकक्ष में लाल ग्रेनाइट पत्थर की खाली शवपेटी मिली है। राजा के शवकक्ष के चारों तरफ एक सुरंग है। अनुमान है कि इसी सुरंग से नील नदी का पानी पिरामिड के नीचे बहता था। इसके दोनों तरफ मंदिर निर्मित थे। मंदिरों के अब अवशेष ही बचे हैं। पिरामिड का भाल हल्का करने के लिए इस कक्ष के ऊपर पाँच कक्ष और बनाए गए थे। नींव में पीले रंग का चूना-पत्थर इस्तेमाल किया गया था लेकिन बाहर की तरफ बहुत अच्छी क्वालिटी का चूना-पत्थर लगाया गया है।

प्रसिद्ध स्फ़िंक्स प्रतिमा-

पिरामिड के समीप ही चौदह मीटर ऊंची प्रतिमा स्थित है। इसकी मुखाकृति मानव की तथा शेष भाग सिंह का है। यह स्फ़िंक्स के नाम से विश्व प्रसिद्ध है।

निर्माण-

ग्रेट पिरामिड के निर्माण में लगभग 23 लाख पाषाण खंडों का प्रयोग हुआ है। प्रत्येक पाषाण खंड का औसत भार ढाई टन है। कुछ पत्थरों का वज़न तो 16 टन से भी ज़्यादा है। यदि इन पत्थरों को 30 से.मी के टुकड़ों में काट दिया जाए तो उनसे फ्रांस के चारों तरफ एक मीटर ऊंची दीवार बन सकती है।

आधुनिक वास्तुशिल्प द्वारा ग्रेट पिरामिड जैसी संरचना का निर्माण कर पाना असंभव है। इसके निर्माण की तकनीकी दक्षता और इंजीनियरिंग आज भी वास्तुविदों के लिए एक चुनौती बनी हुई है। उस समय जब क्रेन जैसे यंत्र का आविष्कार नहीं हुआ था तब इतने विशाल,भारी पाषाण-खंडों को इतनी ऊंचाई पर कैसे लगाया गया होगा। अधिकांश विद्वानों के मतानुसार उन लोगों ने पिरामिड तक एक ढलुआं रास्ता बना लिया होग और निर्माण कार्य के आगे बढ़ने के साथ-साथ वे उस रास्ते को भी ऊंचा करते गए होंगे। लकड़ी की बल्लियों के सहारे अथवा पहिये वाले लकड़ी के ढांचों पर रख कर पत्थरों को इस ढलुआं रास्ते से ऊपर पिरामिड के निर्माण स्थल तक ले जाते होंगे।

यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार नदी से लेकर पिरामिड तक पाषाण खंडों को पंहुचाने के लिए ढलुआं रास्ता बनाने में ही दस साल लग गए होंगे। उनके अनुसार इस विशाल पिरामिड को बनाने के लिए एक लाख आदमियों ने 20 साल काम किया होगा। आधुनिक विद्वानों के मतानुसार हेरोडोटस का यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण है। उनके अनुसार पिरामिड के निर्माणस्थल पर 36,000 से ज़्यादा व्यक्ति एक साथ काम नहीं कर सकते थे। संभवतः हेरोडोटस ने उन लोगों की गणना भी कर ली हो जो पिरामिड के लिए ढलुआं रास्ता बनाने तथा और दूसरे कामों में लगे हों।

विशिष्टताएँ –

वास्तुशिल्प की बात तो अलग है, मिस्रवासी खगोलविद्या और गणित के भी गहन ज्ञाता थे। पत्थरों को इतनी कुशलता से तराश कर फिट किया गया है कि उनके बीच एक ब्लेड भी नहीं घुस सकता है। पिरामिड ओरियन राशि के तीन तारों की सीध में है। पिरामिड को सूर्यदेवता ( मिस्रवासी जिस को माट कहते हैं) के नियमानुसार बनाया गया है। जब सूर्य की किरणें इस की दीवारों पर पड़ती हैं तो वे चांदी की तरह चमकने लगती हैं।

पिरामिड को भूकंप से सुरक्षित रखने के लिए उसकी नींव के चारों कोनों में बॉल और साकेट बनाए गए हैं।

ग्रेट पिरामिड पाषाण के कंप्यूटर जैसा है। इसके किनारों की लम्बाई, ऊंचाई और कोनों को मापने से पृथ्वी से संबन्धित भिन्न-भिन्न चीजों की सटीक गणना की जा सकती है।

ग्रेट पिरामिड में पत्थरों का उपयोग इस प्रकार किया गया है कि इसके भीतर का तापमान हमेशा स्थिर और पृथ्वी के औसत तापमान 20 डिग्री सेल्सियस के बराबर रहता है।

तत्कालीन मिस्रवासी पिरामिड का उपयोग वेधशाला, कैलेंडर, सन डायल और सूर्य की परिक्रमा के समय पृथ्वी की गति तथा प्रकाश के वेग को जानने के लिए भी किया जाता था।

पिरामिड को गणित की जन्मकुंडली भी कहा जाता है। इससे भविष्य की गणना की जा सकती है।

पिरामिड अपने विशाल आकार, अद्वितीय वास्तुशिल्प तथा मजबूती के लिए विश्वविख्यात हैं। इसमें खगोलीय विशेषताएँ भी विद्यमान हैं लेकिन सबसे विलक्षण गुण हैं। इन का जादुई प्रभाव । वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि पिरामिड के भीतर विलक्षण ऊर्जा तरंगें निरंतर सक्रिय रहती हैं जो जड़ और चेतन दोनों प्रकार की वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं। इस विलक्षणता को ‘पिरामिड पावर’ की संज्ञा दी गयी है।

अब यह नयी अवधारणा चिकित्सा जगत में ‘पिरामिडोलोजी’ के नाम से लोकप्रिय होती जा रही है। पिरामिड के आकार की संरचना के भीतर बैठने से सिर दर्द,दाँत दर्द से छुटकारा मिल जाता है। आधुनिक अनुसंधानकर्ता बोबिस ने पिरामिड के आकार की टोपी बना कर पहनी और इस बात को आज़माया। बोबिस का मानना है कि इसको पहनने से दर्द तो दूर हो ही जाता है , अन्य कई प्रकार के मानसिक रोग भी दूर हो जाते हैं।

वैसे तो मिस्र में अनेक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल हैं लेकिन इन पिरामिडों का आकर्षण ही अलग है,विशेष रूप से गिज़ा के ग्रेट पिरामिड का । प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक इन पिरामिडों को देखने के लिए मिस्र पंहुचते हैं।

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प्रमीला गुप्ता